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मई दिवस का महत्त्व

Posted On: 30 Apr, 2012 Others में

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कल अंतर्राष्ट्रीय मई दिवस है जो दुनिया भर के कामगारों और मजदूरों के लिए विशेष महत्त्व रखता है. मई दिवस मनाने की परंपरा 19 वीं शताब्दी में ही शुरू हो गयी थी. अधिकांस लोगों की यह आम धारणा है कि मई दिवस कि शुरुआत साम्यवादियों (communists ) ने की परन्तु ऐसा नहीं है बल्कि मई दिवस सबसे पहले 19 वीं सदी में अमरीकी मजदूरों ने अच्छी पगार और काम के लिए बेहतर सुविधाओं की मांग के चलते मनाना शुरू किया था जिसे बाद में साम्यवादी देशों ने अपनाया और तत्पश्चात समस्त दुनिया में यह दिन मजदूर एकता के प्रतीकार्थ मनाया जाने लगा. इस दिवस का एक ख़ास नारा है – दुनिया के मजदूरों एक हों .

आज जब कि दुनिया द्रुतगति से पूंजीवाद कि ओर बढ़ रही है और यहाँ तक कि चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में भी मजदूरों का शोषण हो रहा है, मई दिवस का महत्त्व कहीं अधिक है क्योंकि यह मजदूर एकता के आवाहन के लिए मनाया जाता है. भारत एवं अन्य गरीब मुल्कों में धीरे धीरे वामपंथियों का वर्चस्व नगण्य होता जा रहा है और इस वजह से मजदूरों के हक की लड़ाई में कमजोरी आ चुकी है ; वहीँ दूसरी और महंगाई और बेकारी की मार ने मजदूर वर्ग की कमर तोड़ कर रख दी है. यह भी गौर तलब है की मई दिवस हमारे देश में राष्ट्रिय छुट्टी नहीं है बल्कि कुछ गिने चुने राज्य (केरल, पश्चिम बंगाल आदि) इस दिन अवकाश घोषित करते हैं. यह इस बात का सबूत है की भारत राष्ट्र अपने मजदूरों को तनिक भर महत्त्व नहीं देता. मजदूरों के अधिकारों के समर्थन में आज तक जो कानून बने उनका परिपालन ठीक से करना तो दूर बल्कि इन कानूनों को ख़त्म करने की बात की जा रही है. मई दिवस हमें याद दिलाता है कि दुनिया के मजदूर एकजुट हो कर अपने हकूकात की लडाई जारी रखें

आई एल ओ. (International Labour Organisation ) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. इन आंकड़ों की अंकगणित देना तो इस छोटे से बलाग में संभव नहीं है पर इनका निचोड़ यह है कि विकाशशील एवं गरीब देशों में युवा बेकारों कि संख्या दिन-ब-दिन बढती जा रही है. नयी तकनीकों के आने से लाखों लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ रहा है क्योंकि जो काम कल तक पचास लोग करते थे वो अब पांच ही लोग कर लेते है. विश्व में वर्तमान आर्थिक अवनति के मद्देनज़र बहुत सी फेक्ट्रियां बंद हो गयी हैं और मजदूर सड़क पर भूखा नंगा हो कर खड़ा है क्योंकि उसके पास और कोई विकल्प नहीं है. भारत की जनसंख्या की औसतन उम्र 28 साल है अर्थात देश में युवा वर्ग सबसे बड़ा तबका है. करोड़ों युवाओं के पास काम नहीं है. यह एक विस्फोटक स्थिति है क्योंकि आम तौर पर हरेक युवक आई. टी. या एम्. बी. ए. नहीं कर सकता की उसे अच्छी नोकरी मिल जाय. हाथ के कामों के लिए जिस हुनरमंदी का विकास करना चाहिए था वो हमारी सर्कार नहीं कर पायी है. लिहाजा युवाओं में बेकारी बढती जा रही है. हुनरमंदी और ट्रेनिंग (skill developement ) को प्राथमिकता नहीं दी जा रही. इसी बजट में स्किल डेवलपमेंट के लिए सरकार ने सिर्फ 1000 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है जो की ऊँट के मूंह में जीरे के समान है.

मई दिवस का सबसे बड़ा महत्त्व यह है की लोग अपने हक के लिए याने रोजगार, सही पगार और प्रशिक्षण व्यवस्था के लिए एकजुट हो कर सरकार को मजबूर करे अन्यथा जो स्थिति है वह भयावह रूप से विस्फोटक है. पता नहीं कब यह ज्वालामुखी फूट पड़े.

- ओपीपारीक43 oppareek43



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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
May 2, 2012

पारीक जी अंततः आपका ब्लॉग उपलब्ध हुआ अन्यथा बार बार ० पोस्ट ओ कमेन्ट वाला मेस आ रहा था.मजदूर दिवस पर जानकारी देनेहेतु धन्यवाद

    omprakash pareek के द्वारा
    May 2, 2012

    निशाजी, धन्यवाद.

aryan dixit के द्वारा
May 1, 2012

pareek ji hum aap se pury tarah se sahmat hai.hum ummeed karte hai ke aapke is blog ka sandes jo aap logo ko dena chahte hai absya pahucega.

rekhafbd के द्वारा
May 1, 2012

आदरनीय पारीक जी सही लिखा है आपने,स्थिति सच में भयावह रूप से विस्फोटक है ,चिन्तन का विषय है ,विचारणीय आलेख |

yogi sarswat के द्वारा
May 1, 2012

आदरणीय पारीक साहिब……सादर नमस्कार ! मई दिवस के सन्दर्भ में आपने बहुत बढ़िया लेख दिया है ! आपने सत्य कहा, स्थिति बहुत विस्फोटक होती जा रही है…..लेकिन इनके बारे में सोचे कौन? इस का सबसे बड़ा उदाहरण इस साल का बजट है, क्या दिया मुलाज़िमों को? और जो एक हाथ से दिया वो दूसरे हाथ से वापिस भी ले लिया…. देखा जाये तो इस सरकार को अपना ही नहीं पता, कि कल इनके साथ क्या होना है, सत्ता में रहेंगे या नहीं…क्या पता? जिस महान आदमी के नाम पर पार्टी बना कर ये राज कर रहे हैं, उस के खून से सनी हुई मिट्टी तक इनके सामने नीलाम कर दी गयी, और इनको शर्म तक नहीं आई….ये भला देश के मजदूरों/मुलाज़िमों के बारे में क्या सोचेंगे? हमारे यहाँ युवा के हाथ में हुनर तो है किन्तु काम नहीं ! सुन्दर और विचारणीय आलेख…

    shashibhushan1959 के द्वारा
    May 1, 2012

    आदरणीय पारीक जी, सादर ! आदरणीय योगेन जी के विचारों से मैं भी सहमत हूँ ! सचमुच स्थिति विष्फोटक तो होती ही जा रही है !

चन्दन राय के द्वारा
May 1, 2012

पारीक साहब , मेरा तो ये सुझाव है की पुरे भारत में काम का समय 6 घंटे होना चाहिय , जो रोजगार के अवसर जरुर पैदा करेगा , ना ही किसी उत्पाद की मूल्य वृद्धि होगी

akraktale के द्वारा
May 1, 2012

आदरणीय पारिक जी सादर नमस्कार, आपने सही कहा है हमारे देश में मजदूर दिवस पर ना छुट्टी ना ही कोई शहर शहर सार्वजनिक कार्यक्रम की मजदूर एक जूट हों. पहले उद्योगों में बड़ी संख्या में मजदूर हुआ करते थे तब उनकी एकाध जन सभा या रैली से मजदूर दिवस का भान होता था किन्तु आज जब कई उद्योग बंद हो गए हैं कई मरणासन्न स्थिति में हैं तब यहाँ कार्यरत मुट्ठी भर मजदूर अपनी रोजी रोटी के चक्कर में खुद ही मजदूर दिवस को भुला चुके हैं.अभी तक अखबारों में एक मई को मजदूरों पर एक कालम अवश्य ही होता था किन्तु आज खुद को देश का प्रमुख अखबार बताने वाले भास्कर में एक विज्ञप्ति के अतिरिक्त मजदूरों पर एक शब्द भी नहीं लिखा जाना आज इस दिवस के महत्त्व को खुद ही बयान करता है.

vikramjitsingh के द्वारा
April 30, 2012

पारीक साहिब……सादर… आपने सत्य कहा, स्थिति बहुत विस्फोटक होती जा रही है…..लेकिन इनके बारे में सोचे कौन? इस का सबसे बड़ा उदाहरण इस साल का बजट है, क्या दिया मुलाज़िमों को? और जो एक हाथ से दिया वो दूसरे हाथ से वापिस भी ले लिया…. देखा जाये तो इस सरकार को अपना ही नहीं पता, कि कल इनके साथ क्या होना है, सत्ता में रहेंगे या नहीं…क्या पता? जिस महान आदमी के नाम पर पार्टी बना कर ये राज कर रहे हैं, उस के खून से सनी हुई मिट्टी तक इनके सामने नीलाम कर दी गयी, और इनको शर्म तक नहीं आई….ये भला देश के मजदूरों/मुलाज़िमों के बारे में क्या सोचेंगे? सुन्दर और विचारणीय आलेख… सादर…..


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