देख कबीरा रोया

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ममता दी ! संभलो, वर्ना बंगाल लात मार देगा.

Posted On: 14 Mar, 2012 Others में

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मायावती का हश्र देख कर भी अगर “ममता दी” को अकल नहीं आई तो फिर स्वयं ब्रह्माजी भी उन्हें रास्ते पर नहीं ला सकते. रेल का महकमा जबरन झपटा और अपने इस मंत्रालय को भगवान् भरोसे छोड़ प्रदेश की राजनीति में लगी रही ताकि सी.पी.एम्. को पछाड़ कर बंगाल की मुख्यमंत्री बन सके. कोई कसार नहीं छोड़ी और यहाँ तक कि कुर्सी के लिए नक्सालियों से भी चोंच भिडाई. इस बीच आधा दर्ज़न से ज्यादा रेल दुर्घटनाये हुयी जिनमें दुर्घटना के शिकार सैंकड़ों यात्री और उनके परिवारजन रोते बिलखते रहे पर हमारी ममता मई के पास उनके आंसूं को देखने कि फुर्सत नहीं थी और ना ही उनहोंने रेलमंत्री के नाते इन दुर्घटनाओं कि जिम्मेदारी ली (याद कीजिये सिर्फ एक दुर्घटना कि जिम्मेदारी लेते हुए लालबहादुर शाश्त्री ने इस्तीफा दे दिया था. बहार हाल उन्हीं कि पार्टी के एक मंत्री ने तनिक रेल भाडा क्या बढ़ा दिया कि ममताजी ने बवेला मचा दिया और अपने ही केन्द्रीय मंत्री के रेल बजट का विरोध कर डाला जो भारतीय संसदीय इतिहास की अभूतपूर्व घटना है.
पहली बात तो त्रिवेदी मंत्री हैं और अपने विभाग के लिए जिम्मेदार होने के नाते बजट बनाने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन हमारी ममताजी इस गंभीर प्रक्रिया को भी घटिया, लोकदिखाऊ राजनीती में ला कर अपने नंबर बढाने की निकृष्ट कोशिश में लगी है. अरे भैया आज आदमी रेल में पांव रखने से पहले सोचने लगा है की कहीं भगवान् को प्यारा ना हो जाऊं क्योंकि रेलयात्रा बेहद जोखिम भरी हो चुकी है – याने सुरक्षा की व्यवस्था सिरे से गायब है. कर्मचारियों और ड्राईवरों की की लापरवाही से दुर्घटनाएं होती है तो मानवीय भूल (human error ) कह कर इन्क्वायरी का सिलसिला शुरू कर दिया जाता है. जो लोग मर-खप गए उनको मुआवजा देने में कोताही बरती जाती है. ममता या उनकी पार्टी के मंत्रित्व काल में इन गुनाहों के लिए कोई जवाबदेही नहीं है क्योंकि यु.पी. ए. को तृणमूल का समर्थन चाहिए. ममता का काम है यु.पी.ए. के हर अच्छे बुरे काम और प्रकल्पों का विरोध करे, यु.पी.ए. छोड़ने की धमकी दे कर ब्लेकमेल करे.

 
त्रिवेदी ठीक कह रहे हैं कि थोड़ा सा किराया बढ़ा कर भी अगर दुर्घटनाओं से सुरक्षा का रास्ता निकले तो कोई बुराई नहीं. इस बात से कौन सहमत नहीं होगा कि पैसे से कहीं ज्यादा कीमत आदमी के जान-माल कि है. सुरक्षा उपकरणों के लिए पैसा चाहिए सो भाड़े नहीं बढेंगें तो रेलवे के पास पैसे कहाँ से आयेंगे. फिर यात्रियों कि सुरक्षा तो रेलवे के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता का कार्य है. पर ममता दी को कौन समझाए. मायावती कि तरह उनकी कार्यप्रणाली भी डिक्टेटर वाली है.

 
उनके पश्चिम बंगाल के अस्पतालों में चिकित्सा सेवाओं के अभाव या लापरवाही से सैंकड़ों बच्चे मरते हैं तो वे कहती हैं कि सी.पी.एम्. कि साज़िश है. अगर महिलाओं का सरेआम” “रेप” होता है तो उनके हिसाब से वो भी सी.पी.एम्. कि साज़िश है. ममता दीदी ज़रा संभलो. बंगाल का मानुष बुद्धिजीवी और समझदार है. तुम्हारा ये नाटक नौटंकी नहीं चलने वाला. उसमें सच को परखने कि शक्ति है. तुम जीत कर पूरे देश को ब्लेकमेल करने में लगी हो यह किसी से छुपा नहीं है. बंगाल के हालात तुम्हारे राज में बद से बदतर होने वाले है. सिर्फ सत्ता में आना काफी नहीं है. अहंकार से काम नहीं चलता. ठोस काम और नतीजे चाहिए. बंगाल में अभी तक तृणमूल की (सिर्फ गुंडागर्दी छोड़) कोई गिनाने लायक उपलब्धि नहीं है. फिर किस बात का गरूर. वो दिन दूर नहीं जब इसी बंगाल की जनता आपको जूते मारेगी और आपको सर छुपाने की ठौर तक नहीं मिलेगी..

 

- ओपीपारीक43 oppareek43

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chandanrai के द्वारा
March 16, 2012

आदरणीय पारीक साब सादर नमस्कार ! आदरणीय साहब, आपने हर महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ है और उसका आंकलन किया है ! बहुत सटीक विश्लेषण और बिलकुल ठीक विचार ! बहुत बेहतर Pls. comment on http://chandanrai.jagranjunction.com/Berojgar

yogi sarswat के द्वारा
March 16, 2012

आदरणीय पारीक साब सादर नमस्कार ! अब इस मुल्क में श्री लाल बहादुर शास्त्री के जैसे नेताओं की कल्पना तक करना मुश्किल है ! अब यदि व्यक्ति देश के बारे में सोचता है पार्टी के विषय में नहीं तो उसका इस्तीफा मांग लिया जाता है ! ममता बनर्जी को ये नहीं पता होगा की सरकार बनाने के बाद क्या जिम्मेदारियां आती हैं ? वो अब भी विपक्ष के जैसा या ये कहूं की अनजानों , अन्भिज्ञों जैसा ही व्यवहार कर रही हैं! बहुत बेहतरीन लेख !बधाई

akraktale के द्वारा
March 16, 2012

पारीक जी सादर नमस्कार, रेल किराए में बढ़ोतरी इस वक्त जरूरी है जो हमारे रेल के पिछड़े ढाँचे में सुधार को गति देगा. ऐसे में अपनी ही पार्टी के मंत्री का अपमान करना निरा मुर्खता है. इससे कोई राजनैतिक स्वार्थ भी सिद्ध होने वाला नहीं है. फिलहाल के चुनाव नतीजों से ये बात अब साफ़ नजर आने लगी है की जनता अच्छे बुरे को समझने लगी है.

dineshaastik के द्वारा
March 15, 2012

पारीखजी, जनता कब तक बेवकूफ बनेगी। ये लोग जनता को केवल वोटर समझते हैं।देश का नागरिक भी नहीं मानते हैं। इन्हें केवल वोट के लिये ही जनता की जरूरत है। सभी पार्टियों की सोच इसी तरह की है, जनता किसे चुने। एक साँपनाथ तो दूसरा नागनाथ।

jlsingh के द्वारा
March 15, 2012

पारीक साहब, सादर अभिवादन! आपने अच्छे सलाह दी थी, पर ममता दी किसी की सुनती कहाँ हैं? उन्होंने प्रधान मंत्री को चिट्ठी लिखकर दिनेश त्रिवेदी की जगह मुकुल राय को रेल मंत्रालय सौंपने की बात कह डाली. शायद यही लोकतंत्र है? जनता को ये लोग अभी भी बेवकूफ ही समझ रहे हैं और कांग्रेस इसे तृणमूल का अंदरूनी बात कह पल्ला झाड़ रही है!……


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