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मानस के तुलसी

Posted On: 8 Nov, 2014 Others में

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( Note: This blog is dedicated to my niece Anita Bharadwaj, who has a deep interest and knowledge on Ramcharit Manas )

होमर द्वारा रचित ‘इलियड’ एक ऐसा महाकाव्य हैं जिस पर पश्चिम में अनेक शोध एवं टीका आदि लिखी गयी हैं . इनके विषय में सैंकड़ों पुस्तकें उपलब्ध है बल्कि विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भी इनको उचित स्थान दिया गया है. इसका मुख्या कारन है की पाश्चात्य संस्कृति ग्रीस (यूनान) और अरब सभ्यताओं से प्रभावित रही है. पूरब की सभ्यता संस्कृति उन दोनों से कहीं अधिक समृद्ध होते हुए भी पश्चिम को कभी नहीं भायी. अगर तुलना करें तो महाभारत और रामायण ( व्यास, वाल्मीकि, तुलसी या अन्य भारतीय के लेखकों द्वारा प्रणीत ) इलियड से इक्कीश पड़ते हैं पर उन्हें आज भी वो अंतर्राष्ट्रीय सम्मान नहीं प्राप्त है जो इलियड को मिला है क्योंकि इसका अनुवाद अंग्रेजी एवं योरुप की सभी भाषाओँ में उपलब्ध है.

रामायण की बात करें तो गोस्वामी तुलसीदास रचित रामायण, जो कि लोकभाषा (अवधी) में लिखा गया है, एक ऐसा महाकाव्य है जो दुनिया की किसी भी भाषा के लिए एक महान उपलब्धि कहा जा सकता है याने इलियड जैसे ग्रन्थ इस प्रकाशपुंज के सामने टिमटिमाते तारे जैसे लगेंगें बशर्ते इस का सुन्दर और गुणवत्तापूर्ण काव्यानुवाद विश्व की अन्य भाषाओँ में उपलब्ध हो जाए.

रामायण को सिर्फ “हिन्दु “धर्मग्रन्थ के रूप में प्रचारित करना भी इसके सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) स्वरुप के लिए गलत साबित हुआ है क्योंकि धार्मिक होते हुए भी इसमें वो सबकुछ है जो सार्वजनीन मूल्यों (universal human values ) से ताल्लुक रखता है. यही कारण है की आज विश्व साहित्य में जो मान्यता महाभारत की बन पायी है वो रामायण को नहीं मिलपाई क्योंकि उसे धर्मग्रन्थ का दर्जा नहीं दिया गया है. महाभारत में कृष्ण को आराध्य ईश्वर के रूप में नहीं चित्रित किया गया है. रामायण में राम को ईश्वर का अवतार माना गया है जो अन्य धर्मावलम्बियों को रास नहीं आया और इसके चलते रामायण के उत्कृष्ट चरित्र चित्रण, छन्दात्मकता, कथावाचन (story telling technique ), मानवीय तत्व ( human elements ) आदि की भी उपेक्षा हुयी है और इस प्रकार रामायण एक विश्वस्तरीय ग्रन्थ का दर्जा नहीं पा सका है. साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखें तो तुलसी को पश्चिम में एक चारण कवि की दृष्टि से देखा गया जिसने मानस की रचना अपने ‘राजा’ राम की स्तुति और यशोगाथा के लिए की रचना की जबकि उनके इस ग्रन्थ के महानायक(राम) एक ऐसा चरित्र है जिसमें वस्तुतः वे सारे मानवीय गुण हैं जो मनुष्य को महा मानव बनाते हैं.

तुलसी, मूलतः एक जनकवि थे जिन्होंने रामायण के मुख्य चरित्र राम को एक आदर्श मानव के रूप में चित्रित किया . उन्होंने इस चरित्र के इर्द गिर्द कुछ पौराणिक गाथाओं को भी गूंथा, जैसे कि उनके पाद स्पर्श मात्र से अहिल्या शिला से स्त्री बनी . ऐसे ही कुछ अन्य चमत्कार भी उनकी रामायण में वर्णित हैं. उनके राम ऋषि-मुनियों, राजाओं, ज्ञानियों, श्रीमंतों, सामंतों,सभासदों और आम जनता यानी सभी के लिए एक आदर्श पुरुष बल्कि अवतारी व्यक्ति थे. पर अगर हम कवि के रूप में तुलसी के जीवन पर दृष्टिपात करें तो पायेंगें कि वे एक अत्यंत दुखी प्राणी थे जिसको अपने उस आराध्य ईश्वर के तथाकथित चमत्कारों से कोई लाभ नहीं हुआ. कहा जाता है जीवन की संध्या में वे दुर्बल बीमार एवं हरतरह दीनहीन रहे. उन्होंने रामभक्त संकटमोचन ‘हनुमान’ की प्रार्थना में कवित्त लिखें पर उनका कष्ट कम नहीं हुआ.

कवितावली एवं अन्य रचनाओं में उन्होंने कई जगह अपनी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का दयनीय चित्रण किया है क्योंकि तुलसी अपने व्यक्तिगत जीवन में एक ‘पीड़ित’ व्यक्ति थे जो खुद को दीनहीन, मलिन और पातकी कहते थे और यह इच्छा भी रखते थे कि उनके ‘पतित पावन’ राम प्रभु उनका इस स्थिति से उद्धार करें. एक सच्चे जन कवि होने के नाते यह सिर्फ उनकी पीड़ा नहीं थी बल्कि पुरे देश और समाज कि पीड़ा थी जो उस कालखण्ड के विदेशी शासन के दौरान बुरी तरह त्रस्‍त और पीड़ित था . इस प्रकार उनका यह दैन्यभाव सिर्फ उनकी अपनी दीनता का ढिंढोरा नहीं था बल्कि एक संवेदनशील कवि का परोक्ष रूप से तत्कालीन समाज के दैन्य एवं व्यथामय जीवन का निरूपण था उन्होंने लिखा :- “दीनहीन, अंगहीन, क्षीण, मलिन, अधि, अघाई”. इसे पढ़ कर आँखों में आंसू आ सकते हैं . उनके लिए श्रीराम एक ऐसे “गरीबनवाज” थे जो न सिर्फ उन्ही के बल्कि पीड़ित जनजन के भी गरीबनेवाज कहे जा सकते हैं. उन्होंने “केवट प्रसंग” और “शबरी के बेर” वाले प्रसंगों में जो चित्रण किया उस से साधारण व्यक्ति के प्रति (राम के माध्यम से) उनका आदर और संवेदना झलकती है. ‘शबरी’ प्रकरण में तुलसीदासजी लिखते हैं :-

“दानव, देवू, अहीश, महीष, महामुनि वापस सिद्धि समाजी
जग जाचक, दानि दुतीय नहीं तुम ही सबकी सब राखत बाजी
एते बड़े ‘तुलसीस’ तउ, शबरी के दिए बिनु तुमरी भूख न भाजी
राम ‘गरीबनेवाज’ भये हो, गरीबनेवाज गरीबनेवाजी”

यहां तुलसी के छंदों की बानगी भी देखने लायक है जहां उन्होंने “गरीबनेवाज” शब्द को तीन जगह तीन अर्थों में प्रयुक्त किया है. इस से यह भी जाहिर होता है कि रामायण के तुलसी कितने समर्थ और सक्षम कवि थे.. राम के बचपन (’ठुमुकि चलत’……) के वर्णन में जब उन्हें उस सुन्दर राजकुंवर की तुलना में अन्य कोई उपमा नहीं सोच पाने की स्थिति मेंउन्हों ने लिखा “रघुवर छबि के समान रघुबर छबि बनिया” है न कमाल.. छंदों में किसी शब्द का बहु आयामी प्रयोग सिर्फ समर्थ कवि कर पाते हैं आधुनिक कवियों में निरालाजी ने अपनी ‘सरस्वती वंदना’ वाली कविता में “नव” शब्द का कितना सुन्दर प्रयोग किया है उसकी बानगी देखिये :-

” नव गति, नव लय, ताल छंद नव, नवल कंठ, नव जलद मन्द्र नव
नव नभ के नव विहग वृन्द को नव पर नव स्वर दे “…..वरदे वीणा वादिनी वर दे

गौरतलब है कि तुलसीदासजी ने रामायण के हर काण्ड की शुरुआत में संस्कृत भाषा में अति सुन्दर छंदों की रचना की है, जिनकी तुलना सिर्फ आदि शंकराचार्य कि संस्कृत काव्य रचनाओं से ही की जा सकती है..

- ओपीपारीक43oppareek43

(नोट:- उपरोक्त विचार लेखक के नितांत मौलिक हैं याने वह यह लिखते समय किसी अन्य लेखन या विचारों से प्रभावित नहीं है. पूर्णतया स्वचिंतन पर आधारित है. )




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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
December 15, 2014

आप का आलेख बहुत रुचिकर लगा | सादर साधुवाद आदरणीय |

    O P Pareek के द्वारा
    December 17, 2014

    धन्यवाद, दुबेजी

bhagwandassmendiratta के द्वारा
November 10, 2014

आदरणीय पारीख जी नमस्कार, मैं कोई बड़ा टीकाकार तो नहीं, हाँ राम चरित मानस लिखते समय गोस्वामी जी की सूझ बूझ उनकी विश्वदृष्टि एवं उच्कोटी की सोच, काव्य रचना आदि का मैं भी कायल हूँ |ऋषि हो कि राक्षस , मानव हो कि पशु, सभी के आचार विचारों को भली भांति जानते हैं वे मानो प्रत्येक घटना उनके समक्ष घटित हुई हो|जैसे हर प्रसंग के वे साक्षी हों| मानस में भाषा एवं विचारों का प्रस्तुतीकरण भी एवं उतनी ही तन्मयता से किया गया है| जहाँ तक मानस को पढ़ने का प्रश्न है यदि आज का युवावर्ग इसे पढ़े तो इस ग्रन्थ की विषयवस्तु उन्हें एक अच्छी से अच्छी मूवी अथवा अच्छे से अच्छे क्रिकेट मैच से भी अधिक आनंदित कर सकती है| परन्तु ऐसा लगता है कि आप राम एवं तुलसी दोनों के चरित्र चित्रण में थोड़ा उलझ गए हैं| फिर भी इस महान काव्य पर अपने सुविचार आम पाठक से समक्ष् लाने के लिए आपको बहत बहुत साधुवाद| धृष्टता के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ| धन्यवाद| भगवान दास मेहंदीरत्ता |

Anita Bhardwaj के द्वारा
November 9, 2014

चाचाजी आपने तुलसी का बहुत अच्छा प्रस्तुतीकरण किया है, लेकिन तुलसी को deen हींन मानना सही नहीं होगा. उन्होंने स्वांत सुखाय रामायण की रचना की और वे अंत में लिखते हैं’ पायो परम विश्राम, राम सामान प्रभु नाही कहूँ. शायद की कोई प्रभु भक्त पैसे वाला होगा. ईश्वर की भक्ति ही उनकी सम्पदा है.

    O P Pareek के द्वारा
    November 21, 2014

    अन्नू, मैंने उन्हें दीनहीन नहीं बताया है बल्कि उन्होंने स्वयं अपने बारे में ऐसा लिखा है. वृद्धावस्था में वे निर्बल और बीमार हो गए थे, शायद इसी निराशा में ऐसा कुछ लिखा गया होगा. बहरहाल ‘राम’ में अटूट विश्वास भी था. “एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास” था राम में उनका. फिर हनुमान उनके संकट मोचन थे. इतनी आष्टा. श्रद्धा और विश्वास तुलसी को छोड़ अन्यत्र नहीं मिलता.

jlsingh के द्वारा
November 9, 2014

एक उदहारण मैं भी देना चाहूँगा उपमा अलंकार के प्रयोग का- निशा अलिनी मुख पंकज रोकी, प्रगट न लाज निशा अवलोकी. सीता स्वयम्बर के समय सीता जी के मौन का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है. मुझे भी रामचरित मानस बहुत पसंद है …अगर सच कहूँ तो रामचरित मानस पढ़कर ही मुझे हिंदी और धार्मिकता में रूचि बड़ी. सुन्दर और सटीक आलेख के लिए आपका हार्दिक अभिनंदन आदरणीय पारीख साहब.

deepak pande के द्वारा
November 8, 2014

बहुत खूब आदरर्णीय पारीक जी आपका चिंतन वंदनीया है रामचरितमानस और तुलसी के बारे में


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