देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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बघेलू - मुन्ना संवाद उर्फ़ कोमन मैन - नेता बात-चीत

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चौराहे पर मुन्‍ना नेता जी को बघेलू नजर आया । चूनाव के मौसम में ऐसा शिकार हाथ लगना, उनकी तो बांछे ही खिल गई। वे उसकी ओर लपके और बोले –

मुन्ना (नेता) : ले भाई बघेलू पांच साल बाद तेरे दरवाजे पर भोट की आस ले के आया हूँ.

बघेलू (आम-आदमी): धन घडी धन भाग जो आप गरीब के दर पे आये मगर वोट और नोट दोनों के तो मालिक आप ही हैं नेताजी, मेरी क्या औकात परन्तु पिछली बार जब आप गरीबी हटाने की बात कर रहे थे, उसका क्या हुआ ?

मुन्ना : अब ये गरीबी-गरीबी क्या लगा रखा है अब तो “पावर्टी” की बात करो.

बघेलू : परन्तु ‘पावरोटी’ तो पहले ही बहुत महँगी हो रही है ; कहाँ से खाएं यहाँ तो दाल-रोटी के ही लाले पड़रहे हैं मालिक.

मुन्ना : अबे घोंचू !! में पाव रोटी की बात नहीं कर रहा में तो पावर्टी की बात कर रहा हूँ जो हमारी सरकार ने 37 फ़ीसदी कम कर दी है.

बघेलू:: अब ऊ सब तो हमका नहीं मालूम पर हमें तो ससुरा प्याज खरीदे के पहले ही जार-जार आंसू रुलाये दे रहा है. दूर से उसकी खुशबूए ले के पेट भर लेते हैं.

मुन्ना: अरे बेवक़ूफ़ तू दूरदर्शन देखता है के नहीं. हमने करीब 14 करोड़ लोगन को गरीबी रेखा से ऊपर उठाय के रख दिया है.

बघेलू ; अब मालिक ई रेखा-वेखा तो हम अनपढ़ आदमी का समझें पर हम तो बस इतना जानत हैं के हमरे भाग की रेखा में तो सिर्फ भुखमरी और जलालत भरी है.

मुन्ना : तुझे कुछ नहीं मालुम. जरा सरकारी राशन की दूकान पर जाओ तो दो रूपया किलो चावल मिल रहा है

बघेलू : हमहू गए रहे साहेब पर दूकान परधानजी की है और उनके पिल्लों ने हमें मार कर भगा दिया और हम खाली हाथ लौट गए.

मुन्ना : का बात करता है रे. बड़े दिमागवालों ने हिसाब लगाया है की कुल 27 रुपये में एक परवार का खान पीना सब हो जाता है. इस से सस्ता कौनो देश इस दुनिया में है तो बताओ.

बघेलू: अब हम ठहरे अनपढ़ गंवार आदमी हम का जाने इतना हिसाब किताब और देश बिदेश के भाव-ताव पर हम जानत चाहत हैं की कौन महान आदमी है जो ई सत्तायिश रुपये का हिसाब लगाए हैं.

मुन्ना: चल में बताता हूँ. एगो सरकारी कमिटी बिठाए रहेन हैं और ओकर परधान तेंदुलकर साहेब ने एक रपट में यह सत्तायिश का आंकडा दियें हैं.

बघेलू: का मज़ाक कर रहे हैं मालिक. तेंदुलकर तो किरकेट के बड़े खिलाड़ी हैं जिनको खेलने का करोड़ों रपय मिलता है. वो तो केक, मेवा-मलाई खात होय्गें; तो भला उन्हें गरीब के आते दाल का भाव का मालूम होगा.

मुन्ना: हद्द होगई, अरे बेवक़ूफ़ में सचिन तेंदुलकर की बात नहीं कर रहा है, मैं तो देश के महान अर्थ शास्त्री तेंदुलकर्जी की बात कर रहा था.

बघेलू : अब गुस्ताखी माफ़ हो माई-बाप पर ऊ कितने बड़े अर्थ शास्त्री हैंगे पर 27 रुपये में हमरा पेट भरने की बात से बड़ा अनर्थ किये हैं सो हमरी राय में वे बड़े “अनर्थशास्त्री” हैं.
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मुन्ना: अबे लल्लू तेरे भेजे में कुछ नहीं पड़ता. अब जरा सोच अगर ऊ याने तेंदुलकर्जी अगर ई फार्मूला नहीं दिए होते तो हम १४ करोड़ लोगों को गरीबी की दीवाल से कैसे छलांग
लगवाते. अब वे सारे के सारे अमीर हो चुके हैं. हम तो मैडम को लिख रहे हैं की श्री तेंदुलकर को तुरत भारत रत्न दे दिया जाय.

बघेलू: ई तो बड़े गज़ब की बात है, अब तनी हमें भी छलांग लगवा दीजिये कारण के हमरे गाँव में क़र्ज़ ना चुकाने की हालत में 13 गरीब किसान ख़ुदकुशी कर चुके हैं और अगली बारी हमरी है. छलांग लगा लें तो शायद इरादा बदल जाए.

मुन्ना (खिसिया कर) :तुम जैसे मूर्खों से बहस करना फ़िज़ूल है आखिर तो निपट गंवार थारे जिसकी खोपडिया में भूसा भरा है. तुम्जैसों को तो परधानजी की पिटाई ही सही है कारण के लातो के देव बातों से कुछ ना समझ सकते . तभी तो गुसाईजी ने ठीक ही कहा है कि:-

ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी.

बघेलू : हॉं सरकार आप सचे ही कही रहे है, हमहु ही समझ न पाए. हम ठहीरे आम आदमी आप जैसन बड़ा लोगन की बात ही ओर है आपह तो बड़ा लोगन की ही सोचोगे। फेर हमहू सोचे है अबके आम आदमी को ही वोट देबे. ऊ शाद हम गरीबन की कुछ सोचे।

मुन्ना:  क्‍ .. क्‍ .. क्‍ … क्‍या?

बघेलू वहां से जा चुका था।

-ओपीपारीक43oppareek43



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