देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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रबीन्द्रनाथ टेगोर - एक प्रेरक ज्योतिपुंज

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तब मैं सिर्फ 10-11 साल का बालक था जब मेरे हाथ ‘गीतांजली’ आई; फिर भी मैंने उसे आद्योपांत पढ़ डाला हालाँकि दार्शनिक भाव की उन कविताओं को समझने की उम्र अभी नहीं हुई थी. इस के बावजूद गीतांजलि पढ़ कर मुझे एक अजीब सी अनुभूति हुई जिसे शब्दों में बयां करना मेरे लिए मुश्किल होगा. मैं काफी पहले से ही उनकी लिखी बाल साहित्य वाली पुस्तकों से परिचित था जो उस समय सभी बच्चो की प्रिय थी क्यों की कविगुरु द्वारा बच्चों के लिए रचित साहित्य हम सभी में एक निराले आनंद की सृष्टि करता था और गुदगुदाता था, जैसे की :-

“बृष्टि पोरे टापुर-टुपुर नोदी ते एलो बाण/

शिब थाकुरेर बिय्ये होलो तीन कोंने दान”

 

अगर आप बंगला नहीं भी जानते हो तो भी इसे गुनगुनाने में कितना मज़ा आता है, स्वयं समझ सकते हैं. उन्ही कैशोर्य के दिनों की बात है जब स्कूल वाले हमें एक्सकर्सन टूर पर शान्तिनिकेतन ले कर गए और वहां का नज़ारा देख कर हम मस्त हो गए. भीड़-भरे कलकत्ता से निकल कर इस सुरम्य उपवन में हमें बेहद ख़ुशी मिली जो आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित है. हमने वहां बच्चों को प्रकृति के साहचर्य में खुले आसमान तले पेड़ों की छाँव में पढ़ते देखा जो हमारे लिए विस्मय पूर्ण था..

 

बाद में जब बड़ा हुआ तो रबीन्द्रनाथ के लेखन को समझने का अवसर मिला. उन्हें खूब पढ़ा और पाया की उन्‍होनें  सब-रस सब रंगों से भरपूर साहित्य सृजन किया था जो मानवता की एक अमूल्य विरासत है.

 

उनके बारे में जब-जब सोचता हूँ तो सबसे बड़ी बात मुझे (और मुझे ही नहीं बल्कि अधिकांश लोगों को) यह लगती है की जैसे वे कोई अत्‍यंत निकट के “अपनें” हैं. जैसे हमारे घर के कोई प्‍यारे-से साधु स्‍वभाव के बुजूर्ग हमारे बीच हों. मेरा मतलब है आप उनकी फोटो देखेंगें तो आपको कुछ ऐसा ही लगेगा. उन के व्‍यक्तित्‍व में कुछ ऐसा अपनत्‍व झलकता है जो अंतर्आत्‍मा तक पहुँचता है. यही बात गांधीजी पर भी लागू होती है. दरअसल ये दोनों ही ऐसे व्‍यक्ति है जिन में ईश्‍वरत्‍व स्‍पष्‍ट परिलक्षित होता है, चाहे आप उनकी फोटो का ही अवलोकन क्यों ना कर रहे हों.

 

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उनके साहित्य सृजन का विस्‍तार अद्वितीय है. उनकी कविताएं हर उम्र के लिए लिखी गई हैं. जब वे बच्चों के लिए लिखते थे तो उन रचनाओं में बच्चों जैसी सरल मासूम और खिलंदरी अभिव्‍यक्ति झलकती है. दूसरी और गीतांजलि मानव की उच्‍चतम दार्शनिक भावनाओं को दर्शाती है. गीतांजलि आजतक लिखी सभी काव्‍य रचनाओं से अलग तरह का कविता संग्रह है जिसमें उन्‍होंनें सुफी, वेदांत और ब्रहम दर्शन का अद्भूत समावेश किया है.  जब लंदन में प्रथम बार सुप्रसिद्ध अंग्रेज कवि डब्‍ल्‍यू बी यीटस ने गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद विद्वत जनों के मध्‍य भावपूर्ण ढंग से, गुरूदेव की उपस्थिति में पढ़ा तो उपस्थित श्रोतागण भाव विभोर हो गए और देर तक करतल घ्‍वनि से कविगुरु को साधुवाद देते रहे. उनका लंदन प्रवास अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण साबित हुआ क्‍योंकि वे एकदम पश्चिम की नजरों में एक महान कवि बन कर उभरे जिसकी परीणिति बाद में नोबल पुरस्‍कार के रूप में हुई. उनकी लंदन यात्रा के विषय में जेस्‍पर स्‍मिथ ने वहां के प्रमुख समाचार पत्र में लिखा की :-

                   “पिछली गर्मियों में हमारे बीच एक व्‍यक्ति आए थे;  उन्हें देख कर अकस्‍मात ऐसा लगा मानों वे इस युग के इंसान नहीं हैं – या तो वे सुदूर अतीत के हैं या फिर अनागत भविष्‍य के हैं पर वे इस वर्तमान के नहीं हैं. हालाँकि वे सागर पार से हमारे पास आए लेकिन उन्हें देख कर लगता था की वे केवल सागर पार से नहीं बल्कि युग-युगान्‍तर की दहलीजें पार कर हमारे पास आएं हैं”.

 

कविता, कहानी, उपन्‍यास, नाटक, निबंध, विचारपूर्ण सामयिक चिंतन – याने ऐसी कोई विधा नहीं जिसे उन्‍होनें अछुता छोड़ा हो. मेरा अपना लेखन भी उनसे प्रभावित रहा है हालाँकि मैं तो सिर्फ एक अकिंचन हूँ. वे मेरे ही लिए नहीं बल्कि आने वाली कई पीढि़यों के लिए एक प्रेरणा पुरूष बने और भविष्‍य में भी यह प्रेरणामयी ज्‍योतिपूँज हमें अपनी रोशनी से अप्‍लावित करता रहेगा, इस में कोई शक नहीं है.

 

उनका व्‍यक्तित्‍व बहुआयामी था. वे एक साहित्‍यकार, चित्रकार, संगीतज्ञ, वाद्यकलाकार, अभिनेता, शिक्षाविद् पर्यटक और महान चिंतक, जिसने कहें की ‘ऑल इन वन’ थे. वे एक मौलिक संगीत विधा के जन्‍मदाता थे जो आज भी रबिन्‍द्र संगीत के नाम से पुरे विश्‍व में विख्‍यात है. उनके चित्रों को देख कर आप चकित रह जाएंगें क्‍योंकि उनकी चित्रांकन शैली बिलकुल अनुठी थी. एक शिक्षाविद् के नाते उन्‍होनें ‘शांतिनिकेतन’ “Shantiniketan” जैसी कालजयी संस्‍था की स्‍थापना की जो आज एक विश्‍वविद्यालय का रूप ले चुकी है.

 

GandhiTagore

 

महात्‍मा गांधी के साथ उनकी रोचक मित्रता थी. जिसमें गंभीर चिंतन के साथ-साथ हास-परिहास भी शामिल था क्‍योंकि दोनों ही विभुतियां विनोदप्रियता की मिसाल थे. गांधीजी के साथ उनकी मित्रता लंबे अरसे तक चली. वे एक दफे छह दिन तक शांतिनिकेतन में गुरूदेव के सानिध्‍य में रहे और इस प्रकार इन दोनों महान हस्तियों में विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ. जहां एक और गांधीजी ने राजनीति के माध्‍यम से मानव स्‍वतंत्रता और स्‍वाभिमान के लिए संघर्ष किया वहीं दूसरी और टैगोर ने साहित्य के जरिए मनुष्‍य की अस्मिता को स्‍थापित करने की कोशिश की. गुरूदेव पाश्‍चात्‍य शिक्षा प्रणाली को एक तरह की गुलामी मानते थे और इसी वजह से उन्‍होनें गुरूकुल परंपरा की महान विरासत को शान्तिनिकेतन में पूनर्स्‍थापित किया.

 

आज जब हम उनकी 150वीं जयंती मना रहे हैं तो हमें इस महान मनस्‍वी से प्रेरणा लेनी चाहिए की हम हर दिशा में पश्चिम की अंधाधुंध नकल करने से बचें.  आज भारतीय संस्‍कृति पर चारों और से कुठाराघात हो रहे हैं. कोई राह नहीं दिखाई देती.  ऐसी स्थिति में गुरूदेव रबिन्‍द्रनाथ टैगोर हमारे लिए वह ज्योतिपुंज है जो हमारा सही मार्गदर्शन कर सकता है.

 

-          ओपीपारीक43 oppareek43

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Phyliss के द्वारा
February 13, 2018

Just what I was looking for.

Candice के द्वारा
January 4, 2018

thanks for the info

KattiestUmp के द्वारा
December 23, 2017

Bitcoin pharmacy के द्वारा
December 3, 2017

thanks for the invfo

bharodiya के द्वारा
July 10, 2011

कविवर को याद दिलाने के लिये धन्यवाद । आज सहित्य फिल्म और टी.वी मे कैद हो गया है । किताबो वाला सहित्य लाईब्रेरी तक सिमित हो गया । खरीदना तो दूर फोकट मे मिले तो भी पढने का टाईम नही । ईस लेख के साथ गितान्जली के हिन्दी भाषान्तर की कोइ पी.डी.एफ फाईल या कोइ लिन्क जोडा होता तो बहुत अच्छा रहता ।

alka singh के द्वारा
May 13, 2011

पारिक जी, नमस्कार उनके बारे में जब-जब सोचता हूँ तो सबसे बड़ी बात मुझे (और मुझे ही नहीं बल्कि अधिकांश लोगों को) यह लगती है की जैसे वे कोई अत्‍यंत निकट के “अपनें” हैं. जैसे हमारे घर के कोई प्‍यारे-से साधु स्‍वभाव के बुजूर्ग हमारे बीच हों. मेरा मतलब है आप उनकी फोटो देखेंगें तो आपको कुछ ऐसा ही लगेगा. उन के व्‍यक्तित्‍व में कुछ ऐसा अपनत्‍व झलकता है जो अंतर्आत्‍मा तक पहुँचता है. आपका लेख अंतर्मन को छू गया .जितना आपने बताया है अब लग रहा है उनके बारे में और भी जानना चाहिए .इतनी बहुमूल्य पोस्ट हम तक पहुंचाने के लिए आपका हार्दिक धन्यबाद .

Charchit Chittransh के द्वारा
May 12, 2011

पारीख जी ; जय हिंद ! श्रद्धेय कवीन्द्र गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगौर जी का उत्कृष्ट जीवन परिचय प्रस्तुत करने पर वधाई एवं आभार ! गुरुदेव के कुछ प्रेरक प्रसंग मुझे भी महान दार्शनिक एवं अनुसरण योग्य ज्ञात हैं किन्तु आज भूलवश उनकी पुण्यतिथि का ध्यान नहीं रह पाया और अनजाने में आज टाले जाने योग्य राष्ट्रगान कागुरुदेव के कुछ प्रेरक प्रसंग मुझे भी महान दार्शनिक एवं अनुसरण योग्य ज्ञात हैं किन्तु आज भूलवश उनकी पुण्यतिथि का ध्यान नहीं रह पाया और अनजाने में आज टाले जाने योग्य राष्ट्रगान का प्रसंग बेमौके प्रतिक्रिया पर पुनर्प्रतिक्रिया रुपी ब्लॉग के रूप में उठा दिया ! प्रसंग बेमौके प्रतिक्रिया पर पुनर्प्रतिक्रिया रुपी ब्लॉग के रूप में उठा दिया ! स्वर्गीय गुरुदेव को श्रद्धांजलि के साथ ही उक्त ब्लॉग एक सताह के लिए हटा रहा हूँ !

    surendrashuklabhramar5 के द्वारा
    May 13, 2011

    प्रिय ओ.पी .प्रतीक जी -सार्थक लेख गुरु देव रबीन्द्रनाथ जी प्रतिभा के इतने धनी थे जिन्होंने की विश्व भर में अपने भारत का नाम किया शांति निकेतन में जा सचमुच शांति ही मन में पैठ जाती है बृष्टि पड़े टापुर टुपुर बच्चों के लिए भी और बड़ों के लिए भी बहुत सुन्दर कविता लिखा है उन्होंने जैसा की चर्चित जी ने लिखा उनकी पुण्य तिथि का याद नहीं रहा तो ये तो निम्न है ये तो जन्म दिन था ९.५.१८६१ .. पुण्य तिथि है ७.८.१९१ -७ अगस्त

    surendrashuklabhramar5 के द्वारा
    May 13, 2011

    उन्होंने जैसा की चर्चित जी ने लिखा उनकी पुण्य तिथि का याद नहीं रहा तो ये तो निम्न है ये तो जन्म दिन था 9.5.1861 पुण्य तिथि है 7.8.1941


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