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"उड़ता पंजाब" - उड़न छू:

Posted On: 8 Jun, 2016 में

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एक समय कोई स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं कर सकता था कि जो पंजाब इस देश को सर्वाधिक गेंहू-चावल के सोने कि उपज दे कर निहाल करता रहा है उसकी युवा शक्ति एक दिन नाकारा नपुंसक बन कर रह जायेगी. समृद्धि आई और इस के साथ साथ बुराइयां भी पनपी पर एक सीमा तक तो ऐसा होना स्वाभाविक होता पर देखा गया कि कालांतर में शनेः शनेः नशे का जहर लोगों कि नस-नस में भरता चला गया. पडोसी देश कि मेहरबानी से तस्‍करी के रास्ते नशीले द्रव्यों कि आमद भरपूर हुयी और आज भी हो रही है. इलज़ाम है कि इसमें सत्ताधारी पार्टी के बड़े नेताओं का भी हाथ है.खुद प्रकाश सिंह बादल के रिश्तेदार और मंत्री मजीठिया भी शक के घेरे में आये. ज़ाहिर है इतना बड़ा नशे कि तश्करी और सेवन करने वालों का नेटवर्क बिना रसूकदार लोगों की साझेदारी के चलना असम्भव है.


बहरहाल फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप ने इस गम्भीर सामजिक विषय पर फिल्म बनायीं जिसका नाम रखा गया “उड़ता पंजाब” जब इस फिल्म के गीत और ट्रेलर आदि सोशल नेटवर्क पर आया तो कुछ लोगों ने हड़कम्प मच दिया. उधर सेंसर बोर्ड के बदनाम तानाशाह पहलाज निहलानी ने भी अपनी कैसी चलाने में कोई कसार नहीं छोड़ी. सेंसर बोर्ड को इस फिल्म के संवादों में अश्लीलता नज़र आई और इसके लिए निर्माता इस फिल्म को वयस्क फिल्म (adult movie ) का प्रमाण पत्र लेने को भी राज़ी थे पर इन सबके बावजूद सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 89 कट कर डाले जो कश्यपजी को नागवार गुज़रे. पर सबसे बड़ा तमाशा तब हुआ जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म के नामकरण से “पंजाब” शब्द हटाने को कहा जो की सरासर ज्यादती कही जायेगी. कैसा देश, कैसा लोकतंत्र और किस प्रकार की अभिव्यक्ति की आज़ादी है ये ? राजनेताओं, खासकर अकालियों और आप पार्टी के सरगनाओं को ‘पंजाब’ शब्द इसलिए नहीं भाया कि इस से पंजाब की बदनामी होती है. कितना हास्यास्पद तर्क है यह. उन्हें तो इस फिल्म के निर्माता निर्देशकों को धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने एक सशक्त फिल्म के ज़रिये पंजाब के इस ज्वलंत नशाखोरी कि समस्या को उठाया है जिसकी वजह से पंजाब के अधिकांश युवा और अधेड़ बर्बाद हो रहे हैं. परिवार प्रभावित हैं. लोगों का अनमोल स्वस्थ्य प्रभावित है. और ये लोग इस गम्भीर समस्या पर बानी फिल्म पर राजनीति कर रहे हैं. इस से ज्यादा शर्म कि बात पंजाब के लिए और क्या होगी भला. पर क्या करें – उधर बिहार में बिलकुल नालायक परीक्षार्थी, जिन्हें अपने विषय का कक्का भी नहीं आता, टोपर बन जाते हैं. कैसी शिक्षा व्यवस्था चल रही होगी इस बिहार प्रान्त में इसका अंदाजा पाठक सहज ही लगा सकते है. यही छात्र 99% जाली नंबरों वाली मार्कशीट के बूते पर दिल्ली जैसे शहर में आकर अच्छेे कालेजों में प्रवेश पा जाते हैं और दिल्ली के स्थानीय प्रत्याशियों को उन कालेजों में प्रवेश नहीं मिलता. कितना बड़ा धोखा है ये, जरा सोचिये तो.. जो देश या जिस देश के प्रांत अपनी बुराइयों से आँख से आँख मिलाने से कतराते हैं उनका पतन अवश्‍यंभावी है. संक्षेप में कहा जाए तो जो पंजाब कभी अच्छी पैदावार के बल पर तरक़्क़ी के आसमान को छूने ‘उड़ता’ नज़र आ रहा था वो इस नशाखोरी के चलते कभी ‘उड़न-छू’ हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि आज का पंजाब इस भयावह सच से आँख चुरा रहा है

- ओपीपारीक43 oppareek43



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Boog के द्वारा
July 11, 2016

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