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दो साल कम, अभी तीन साल और इंतज़ार ?

Posted On: 31 May, 2016 में

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चाहे केंद्र हो या राज्य सरकारें अपनी तथाकथित उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने में सिद्धहस्त हैं. राष्ट्रिय स्तर के अखबारों एवं अन्य मीडिया मंचों पर बड़े-बड़े विज्ञापन छापते हैं जिनमें नेताओं की तस्वीरें इस प्रकार प्रदर्शित की जाती है जैसे विज्ञापित योजनाओं का सारा पैसा फोटो वाले नेताओं ने अपनी जेब से दिया हो. इस प्रकार इन विज्ञापनों पर अरबों करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं जो करदाता की पॉकेटमारी कही जा सकती है.अगर अपने आप को जनता का असली नुमाइंदा बताने वाले केजरीवालजी की सरकार इन विज्ञापनों पर अन्धाधुन्द खर्च करती है तो मोदीजी के समर्थक उन पर फब्तियां कसते हैं और जब यही काम केंद्र सरकार मोदी-राज के दो साल होने पर करती है तो उनके केम्प से फुसफुसाहट तक नहीं होती. पर किसकी कहें इस मामले में सारे के सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. अखिलेशजी को ही लीजिए, उन पर तो जैसे ऐसे विज्ञापनों का नशा छ गया हो, गोया उत्तरप्रदेश की सारी तरक़्क़ी इन विज्ञापनों और योजनाओं के चित्रों में सिमट कर रह गयी हो.



मोदीजी के कार्यकाल के २ वर्ष पूरे होने पर जो जम्बूरी इंडिया गेट पर देखने को मिली वहाँ तो बेचारी आम जनता को पास तक नहीं फटकने दिया गया – पुलिस वालों ने हड़का-हड़का कर भगा मारा जबकि श्रोताओं में अफसर, नौकरशाह, मनसबदार, सांसद तालियां पीटते रहे. बहरहाल इन दो सालों की उपलब्धियों के गीत गाने वाले यह नहीं बता पा रहे कि सरकार ने कितने वादे पूरे किये गए और कितने नहीं.. जब हमने पूछा तो कहा गया कि कैसी बात करते हो भला साठ साल का कूड़ा बिचारे मोदीजी महज दो साल में कैसे हटा सकते हैं. मैंने कहा चलो मान लिया पर अगले तीन साल में वादे पूरे कर दें तो भी देश के पौबारा पच्चीस मानेंगे परन्तु हमें शक है. इस पर उन्होंने कहा कि जनाब तीन साल क्यों मोदीजी तो अभी तीस साल तक कुर्सी पर रहेंगें. भला ऐसा महान नेता देश को कब नसीब होगा. बेशक. हम भी उन्हें एक महान नेता मानते हैं हम तो खुद यही चाहते हैं कि वे जुग-जुग जियें और हमेशा यों ही देश का उद्धार करते रहें पर जनाब इस देश की जनता का क्या भरोसा जो ठोकरें खाकर भी लालू जैसे निकम्मे को सत्ता में ला सकती है . सो बेहतर होगा कि मोदीजी बाक़ी तीन साल में ही अपना देश-उद्धार कार्यक्रम पूरा कर ले वर्ना जो जनता राजीव गांधी जैसे बन्दे को प्रधान मंत्री बना सकती है वो राहुल गांधी को भी कुर्सी पर बैठा सकती है. और अगर राहुल सत्ता में आये (जो फिलहाल असम्भव प्रतीत होता है) तो कल्पना कीजिये इस देश का क्या हाल होने वाला है.



लगता है आप अभी तक मेरी इस तमाम लफ़्फ़ाज़ी का मकसद नहीं समझे. दरअसल मैं ये कहना चाहता हूँ कि राजनीति तो यत्र-तत्र-सर्वत्र एक जैसी है पर जनता चाहे तो इसे दुरुश्त कर सकती है. हमारे देश की जनता इस मामले में अब तक तो बिलकुल फिसड्डी और अपरिपक्व साबित हुई है. मसलन एक कॉमेडियन (मसखरे ) ने लताजी और तेंदुलकर कि नक़ल बना कर खिल्ली क्या उड़ा दी मानो जैसे कोई भूचाल आ गया हो .. अगर लोकतंत्र में विश्वास करें तो ये कोई मुद्दा ही नहीं है. लोकतंत्र में मशहूर हश्तियों का मज़ाक उड़ाना कोई गुनाह नहीं मान जाना चाहिए वर्ना जनतंत्र कैसा. जब इन हश्तियों को बेहिसाब सम्मान और प्रशंसा का पात्र बनाया जाता है तो उनके लिए कभी कभी हास्य और ‘सटायर’ का प्रयोग भी गलत नहीं है. सबसे बुरी बात कि मनोरंजन कि दुनिया में अगर कोई कलाकार ( जैसे कि तन्मय भट्ट) ऐसा कोई वीडियो लोगों को हसाने के लिए बना भी दे तो इसमें इतनी राजनीती भला किस लिए. आप समझे नहीं. हर बात को राजनीति का जामा पहना कर ये सब राजनीतिज्ञ अपना उल्लू सीधा करते हैं क्योंकि ये जानते हैं कि जनता ने तो उल्लू बनना ही है क्योंकि वो सदा से ऐसा करती आई है. पर आप इनके झांसे में क्यों आये.



जहां तक मोदीजी के दो सालों का प्रश्न है, बेशक कई अच्छे काम हुए पर तथाकथित “अच्छे दिन” आने में काफी समय लगेगा. बड़े स्तर (लाखों, करोड़ों, अरबों रपयों के घोटाले) वाले भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हुआ है. गरीबों के लिए बैंकिंग, बीमा, फसल हानि पूर्ती आदि योजनाएं बेशक कल्याणकारी साबित हो रही है परन्तु अभी बहुत कुछ करना बाकी है. कुछ वादों पर तो सरकार ने कोई पहल तक नहीं की
(मसलन युवाओं को रोज़गार मुहैया कराना आदि) पर उम्मीद है कि बचे तीन सालों में इन दो सालों से अधिक द्रुत गति से काम होगा. 2019 की बात तब तक नहीं करूँगा जब तक मुझे इस देश कि जनता के परिपक्व सोच पर विश्वास ना हो जाए. मोदीजी कि सफलताओं के अलावा उनकी असफलताओं पर भी जन-बहस होनी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र का आधार ही ‘डायलॉग’ है. संवाद जरूरी है और चाटुकार लोग संवाद में विश्वास नहीं रखते, सिर्फ व्यक्ति विशेष को महिमामंडित करने में विश्वास रखते हैं.



मोदीजी के रूप में देश को बेशक एक सक्षम प्रधानमंत्री मिला है पर अकेले एक व्यक्ति से देश का भला नहीं हो सकता. उनकी टीम को भी उन्ही की तरह से मेहनती, ईमानदार और जिम्मेदार बनना होगा.



आज कि तारीख में तो कई केंद्रीय मंत्री गैर ज़िम्मेदाराना बयान देने से बाज नहीं आते और मोदीजी उनकी इस हरकत पर चुप्पी साध लेते है जो कि सही नहीं. माझी नहीं तो सवारियां ही नाव को बीच मझदार में डुबो देगी – ऐसा मेरा अपना विचार है. मोदीजी इस चेतावनी को गम्भीरता से लें.



आज 70 साल बाद भी इस देश में कुछ लोग सोचते हैं कि मुस्‍लिम सम्प्रदाय देश के प्रति वफादार नहीं है. खासकर बीजेपी और संघ में ऐसा मानने वाले अनेक हैं और ये लोग देश के लिए हितकर नहीं हैं क्योंकि एकबार को कल्पना कर मान भी लें कि वे लोग देश के प्रति वफादार नहीं हैं तो भी उन्हें दुत्कारने के बजाय उन्हें वफादार बनाने की चेष्टा करनी चाहिए क्योंकि 21 करोड़ लोगों की गुडविल और सहकारिता के बिना यह देश अपनी एकता और अखंडता को कायम नहीं रख पाएगा. मेरी बात कड़वी जरूर लगेगी पर सच्चाई यह है कि पूर्व की सरकारों ने जैसी नीति मुस्लिम सम्प्रदाय के साथ चलायी, उन्हें वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया, कुछ हद तक तुष्टिकरण अपनाया – इन सबसे ना तो देश का भला हुआ और ना ही मुसलामानों का भला हुआ . आज वे दलितों कि भांति एक पिछड़ा वर्ग बन कर रह गए. शिक्षा की जरुरत थी पर शिक्षित होते तो सम्भवतः उन पार्टियों (कांग्रेस, समाजवादी, मार्क्सिस्ट, तृणमूल) के झूठे वादों और बहकावों में आ कर उन्हें वोट नहीं देते.



इन दो सालों में मोदीजी ने धुआंधार विदेश यात्राएं की परन्तु मुझे नहीं लगता की उन यात्राओं से भारत देश को कुछ ख़ास हासिल हुआ बल्कि उनकी पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ फैलाना निरर्थक और हानिकारक रहा है. इस सन्दर्भ में उनकी सबसे बड़ी सफलता अफगानिस्तान – ईरान के साथ चाबहार पोर्ट को अंजाम देने का समझौता कहा जा सकता है.



मोदीजी कुछ कम बोलें तो देश के लिए बेहतर होगा क्योंकि जितना बोलते हैं उस का अंश मात्र कर नहीं पाते. ख्वामखाह लोगों की उम्मीदें बंध जाती है और फिर उन पर पानी फिर जाता है जैसे कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के वायदे आदि. आर्थिक मंच पर भी मोदीजी कुल मिला कर असफल रहे हैं. निर्यात रसातल में चला गया है. कारपोरेट आय दिन ब दिन कम होती जा रही है जिसका दुष्प्रभाव आयकर आमद पर पड़ रहा है. निचले याने बाबू तबके द्वारा चलाये जा रहे भ्रष्टाचार पर कोई अंकुश नहीं है. केंद्र सरकार के मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस ऊपर से लेकर नीचे तक सिरे से भ्रष्ट है. यहां तक कि चार महानगरों कि तुलना में देश की राजधानी दिल्ली में सर्वाधिक अपराध हो रहे हैं. मोदीजी को इन “उपलब्धियों” पर भी ध्यान देने कि जरूरत है.



देश के वित्त मंत्री जेटली साहेब उच्चतम और उच्च न्यायालयों द्वारा कार्यपालिका के काम में दखलंदाज़ी की बात करते समय यह भूल जाते हैं कि संसद में बैठे चोरों (सभी नहीं) और राज्यों के भ्रष्ट मंत्री और अफसरों की चोरी और सीनाजोरी पर लगाम लगाने के लिए क्या किया गया. अगर न्यायपालिका इन पर नकेल ना कसे तो ये लोग देश को बेच खाएंगें. छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार ने पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नक्सल समर्थन का बहाना बना कर जिस तरह प्रताड़ित किया हुआ है उस विषय में मोदीजी कुछ नहीं बोलेंगें. “व्यापम” घोटले की हत्याओं का भी मुख्य मंत्री के पास कोई विश्वसनीय जवाब नहीं है. मेरा मतलब है क्या बीजेपी और क्या कांग्रेस सभी एक थैली के चट्टे बट्टे हैं – कोई ज्यादा तो कोई कम. सिर्फ अकेले मोदीजी के ईमानदार होने से बात नहीं बनती . उन्हें इन सब को सुधारना होगा. संघ की दखलअंदाज़ी पर भी रोक लगानी होगी. पाकिस्तान की नापाक हरकतों पर शिकंजा कसना होगा. कश्मीर के अलगाववादियों को जेल में डालना होगा. खुल कर आर्टिकल 370 का विरोध करना होगा चाहे पीडीएफ से गठबंधन टूटे तो टूटे . पंडितों को ना केवल उनके घरों में बसाना होगा बल्कि समुचित सुरक्षा देनी होगी. कश्मीर में खुराफाती ततवों से कड़ाई से निबटना होगा, चाहे सैंकड़ों कश्मीरी कट्टरपंथियों की जान से खेलना पड़े, परवाह नहीं करनी होगी. जो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय कश्मीर में पाक की घुसपैठ और गिलानी जैसे नेताओं की सांप्रदायिक और भारत विरोधी गतिविधियों पर चुप्पी साधते है, उनकी परवाह करना व्यर्थ है.



अगर दो सालों का सही मूल्यांकन किया जाय तो कुछ अच्छी बातों की शुरुआत कही जा सकती है पर ठोस कुछ नहीं हो पाया है. कुछ अच्छी सरकारी योजनाओं के परिणाम शीघ्र नहीं होकर दूरगामी है. इनका प्रभाव अगले तीन साल में परिलक्षित होगा, अगले तीन साल की प्रतीक्षा इस उम्मीद से करेंगें कि मोदीजी बातें कम और काम ज्यादा करें पर अकेले नहीं बल्कि उनकी पूरी टीम मुस्तैदी से राष्ट्र निर्माण के कर्त्तव्य में लग जाए. ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होने वाला. ठोस काम कर के दिखाना होगा. चाटुकारों और चमचों से बचना होगा.

- ओपीपारीक43oppareek43



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
June 1, 2016

श्री पारिख जी उत्तम राजनितिक बिश्लेष्ण अंत में ‘अगले तीन साल की प्रतीक्षा इस उम्मीद से करेंगें कि मोदीजी बातें कम और काम ज्यादा करें पर अकेले नहीं बल्कि उनकी पूरी टीम मुस्तैदी से राष्ट्र निर्माण के कर्त्तव्य में लग जाए. ढिंढोरा पीटने से कुछ नहीं होने वाला. ठोस काम कर के दिखाना होगा. चाटुकारों और चमचों से बचना होगा.’ मोदी जी से अच्छी ही आशाएं हैं

    O P PAREEK के द्वारा
    June 1, 2016

    सही उम्मीदें बहुत हैं और सभी चाहते हैं की वे इसमें खरे उतरें. बेशक श्री मोदी एक महान नेता हैं और देश के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं क्योंकि वो ज़ज़्बा उनमें मौजूद है.

rameshagarwal के द्वारा
May 31, 2016

जय श्री राम पारीख जी विवेकपूर्ण लेख के लिए धन्यवाद् पर कुछ विन्दुओ से हम सहमत नहीं मतभेद है मनभेद नहीं मुसलमान अपनी हालत के लिए खुद ज़िम्मेदार वे मौल्वियो को क्यों सुनते क्यों नहीं शिक्षा लेते.हर बात में हिन्दुओ का विरोध और इस्लाम खतरे का नारा लगते कैसे आक्रमणकारी है टीवी डिबेट के अलावा पच्छिम बंगाल और केरला के अलावा उत्तर प्रदेश में देखने को मिलता है.अदालत अच्छे कार्य करते पर लालू ऐसे अपराधी को जमानात्दे कर राजनीती में खुली छूट और jnu के राष्ट्र विरोधी विधुयार्थियो को जमानत कभी कभी निराशा और शक पैदा कर देती.हम लोग तो भगवान् रामजी और कृष्णा जी पर भी दोष लगते फिर मोदीजी किस खेत की मूली .हम भगवान् के आभारी की मोदीजी ऐसे नेता देश के प्रधान मंत्री है उनके ज्यादातर मंत्री अच्छे कार्य कर रहे विरोधी इतनी गाली देते उसके जवाब देने पर मीडिया सवाल पूंछता लेकिन विरोधियो पर चुप .खैर उम्मीद में दुनिया आयाम हमने अपने लेख में बहुत उप्लाब्ब्धिया बताई.विस्तृत लेख के लिए साधुवाद.

    O P PAREEK के द्वारा
    June 1, 2016

    रमेशजी, आपकी सारी बातों से सहमत हूँ, पर मुस्लमान मौलवियों के चक्कर में इसलिए पड़े हुए हैं क्योंकि शिक्षित नहीं हैं मोलवियों और कांग्रेस/सपा जैसी पार्टियों का निहित स्वार्थ भी हैं की मुस्लिम समुदाय अनपढ़ बन रहे ताकि उन्हें ब्लॉक वोट मिलते रहें. मुस्लिम सम्प्रदाय की शिक्षा और विकास बहुसंख्यक हिन्दुओं के hit में है अन्यथा वे IS जैसे खूंखार आतंकियों के मोहरे बन सकते हैं जो इस देश को नुक्सान पहुँचाने की फ़िराक़ में हैं.. JNU में लगे राष्ट्रविरोधी नारे अवश्य दुर्भागयपूर्ण हैं परन्तु मेरी राय में मात्र नारे लगाना देशद्रोह की श्रेणी में नहीं आता. दिशाहीन छात्र समुदाय को सही राह दिखाना भी समाज का कर्तव्य है. उन्हें जेल में दाल देना मूर्खता होगी. फिर आप बताइए कि दावूद इब्राहिम जैसे देशद्रोही के साथ संपर्क रखने वाले राजनेताओं का क्या किया जाए. यह सच है कि अभी भी कई सियासतदां उसके माद्यम से गलत कामों को अंजाम देते हैं. क्या वे देशद्रोही नहीं हैं. उनपर मुक़दमा क्यों नहीं चलता. उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया जाता. देशद्रोह कि बात करें तो मैं ऐसे कई नमूने बता सकता हूँ जो बकायदा देशद्रोह जैसे अपराध में लिप्त हैं. ऐसे में सिर्फ JNU के विद्यार्थियों पर ही क्योंकर गाज गिरी.


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