देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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जय कन्हैया 'लाल' (कुमार) की

Posted On: 15 Mar, 2016 में

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जेएनयू छात्र संघ के नेता व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को जिस प्रकार ‘देशद्रोह’ का आरोप लगा कर जेल में ठूंस दिया गया, उस से सरकार एवं प्रमुख सत्ताधारी दल (याने बीजेपी) दोनों को कोई फायदा होने के बजाय नुकसान हुआ और साथ-साथ तज्जनित बहस से तो पूरे देश का अहित हुआ क्योंकि देश के युवाओं की वैचारिक ऊर्जा पर कुठाराघात करने से युवाओं में व्याप्त असंतोष और अधिक गहरा गया.


हम सभी जानते हैं की एक लम्बे समय से JNU में वामपंथी विचारधारा का बोलबाला है जिसमें अध्यापकों और छात्रों का अधिसंख्य वर्ग शामिल है. अब लोकतंत्र है तो हरेक को अपने-अपने सिद्धांतों (ideologies ) पर चलने और बोलने का अधिकार है. वैसे भी वामपंथी पार्टियां राज्यों और केंद्र की सरकारों में रही है . अधिक अरसा नहीं हुआ जब कि CPM तत्कालीन UPA सरकार का एक हिस्सा थी. सो इस बात से किसी को क्यों एतराज हो कि वहाँ ( JNU में ) कम्युनिस्टों का बोलबाला है और कि कन्हैया कुमार एक कम्युनिस्ट हैं.


मुझे तो एतराज़ इस बात से है कि इस घटनाक्रम के दौरान, राष्ट्रीयता और राष्ट्र विरोधिता को परिभाषित करने का जिन लोगों ने ठेका लिया उन्होंने कभी अपने गिरेबान में झाँक कर भी नहीं देखा और टूट पड़े नारे लगाने वालों तथा वहाँ उपस्थित छात्र नेताओं पर. वे यह भूल गए कि देश कि युवा शक्ति के साथ इस तरह दुर्व्यवहार के नतीजे देश के लिए घातक सिद्ध हो सकते हैं. यह इस बात से साबित हो जाता है कि कन्हैया कुमार को देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों का समर्थन मिला है जिसे देख कर वर्तमान सरकार सहम सी गयी है. ये लोग RSS , (VHP , ABVP , बजरंग दल आदि ) व्यर्थ का भेदभाव फ़ैलाने से बाज नहीं आते और सरकार चुपचाप खड़ी तमाशा देखती रहती है. कोई ‘वन्दे मातरम’ या फिर ‘भारतमाता कि जय’ नहीं बोलता वो इनकी नज़रों में देश विरोधी हो जाता है. यह कैसी मानसिकता है इनकी. मेरी समझ से बाहर है. गया मेरे जैसे करोड़ों हिन्दुस्तानी इनकी नज़रों में देश विरोधी है क्योंकि मई विचार इनके विचारों से मेल नहीं खाते. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता से इन्हें कोई मतलब नहीं.


बहरहाल ये लोग कन्हैया कुमार का भी कुछ नहीं बिगाड़ पाये. साक्ष्यों के आभाव में न्यायालय ने कन्हैया कुमार को जमानत पर रिहा तो कर दिया पर साथ-साथ बेवजह कि उपदेशबाज़ी करते हुए उन्हें ‘सुधरने’ कि नेक सलाह दे डाली जो कि एक मज़ाक कहा जा सकता है क्योंकि जज महोदया क्या सुधारना है, यह अस्पष्ट है. काश वे पुलिस, प्रशासन और हमारी केंद्र सरकार को भी सुधरने कि हिदायतें देती तो बेहतर होता. खैर इन सभी ( पुलिस, प्रसाशन, न्यायपालिका, केंद्र सरकार और मीडिया ) ने मिल कर कल के छात्र नेता कन्हैया कुमार को युवाओं और बुद्धिजीवियों की नज़र में “हीरो” बना दिया है.


मुझे लगता है कि अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता तो इस देश में सिर्फ घाटी के कश्मीरियों को ही प्राप्य है बाकी हिन्दुस्तानी अगर कुछ खुल कर बोलें तो वे राष्ट्र विरोधी करार दिए जायेंगें और यह भी हो सकता है कि उन पर देशद्रोह का मुक़दमा दायर हो जाए तो भी आश्चर्य नहीं. ज़ाहिर है कश्मीर घाटी में तो अक्सर ही तथाकथित देशद्रोही नारे लगाए जाते हैं. पाकिस्तान ही नहीं बल्कि IS जैसे कुख्यात अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठन तक के झंडे लहराए जाते हैं फिर भी कोई देशद्रोह का आरोप नहीं लगता. लगे भी कैसे ? क्योंकि वहाँ हमारी देश भक्त पार्टी BJP आज कश्मीरी पार्टी PDP के साथ मिल कर सरकार चला रही है और यह सर्वविदित है कि PDP अफजल गुरु को न केवल “शहीद” मानती है बल्कि उसने गुरु के समर्थन में कश्मीर विधान सभा में प्रस्‍ताव तक पास किया है.


उधर हमारे ‘हीरो’ कन्हैया कुमारजी है जो मीडिया को रोज़ इंटरव्यू पर इंटरव्यू दे कर राष्ट्र नेता बनने कि मुहीम पर है. CPM और CPI खुश हैं (बकौल “मोगाम्बो खुश हुआ”) क्योंकि चुनावी सीजन में उन्हें एक बढ़िया भाषण देने वाला छात्र नेता मिल गया जो स्वयं कम्युनिस्ट विचारधारा रखता है. हमारा हीरो यह भूल कर रहा है कि जो CPM उसे बंगाल भेज कर चुनाव प्रचार में लगाना चाह रही है उसने अपने 34 वर्ष के शासन काल में बंगाल प्रान्त का भट्टा बिठा दिया था. यही नहीं रूस, चीन और अन्य कम्युनिस्ट शासित देशों में ऐसे शैतान कम्युनिस्ट नेता हुए जिन्होंने गरीब किसानो और कामगारों कि व्यापक हत्याएं करने से संकोच नहीं किया. दुनिया जानती है कि किस प्रकार माओ जे दुंग, स्टालिन और लेनिन ने लाखों निर्दोष लोगों को ‘प्रोलेतेरियत’ के राज के बहाने मौत के घात उतार दिया. अतएव मेरी तो श्री कन्हैया कुमारजी को यही नसीहत है कि वे इन कम्युनिस्टों से बच कर रहें. इसी में उनकी और देश कि भलाई है.

-ओपीपारीक43 oppareek43

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

r c purohit के द्वारा
July 15, 2016

completely biased blog, supporting Anti-India slogans and supporting slogans of breaking India is nothing but DESHDROHITA, the video clippings clearly show the anti India slogans, JNU is nothing but MUFTKHORO KA ADDA, why the honest tax payers should pay for these rogues hundreds of these MUFTKHORS ARE sons of politicians or terrorists like CPI MP’s daughter, Umer khalid etc. In the name of independence of speech anti nationalism can not and should not be allowed. First thing they should pay full fees and hostel charges, why the tax payers should pay.

Shobha के द्वारा
March 18, 2016

श्री पारिख जी मैरी आपसे प्रार्थना है आप आशा सहाय जी का शांति सेलेख पढ़े “आन्दोलित युवामानस”

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
March 17, 2016

श्री ओ.पी पारीक जी आपका लेख पढा । कुल मिला कर ठीक ही लगा लेकिन यह कहना कि देश मे अभिव्यक्ति की आजादी है सभी को अपने विचार रखने की इसलिए कन्हैया पर इतना शोर मचाना ठीक नही था लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि उसने कहा क्या है । जिस तरह के विचार उसने प्रकट किये वैसे विचार तो शायद पाकिस्तानी भी भारत के लिए नही रखते होंगे । अच्छा होता वह सरकार की नीतियों की आलोचना तक अपने को सीमित रखता लेकिन उसने तो देश के सम्मान पर ही हमला बोल दिया । यह आजादी नही बल्कि आजादी का दुरूपयोग है । अब हद तो यह कर दी कि सेना को ही बलात्कारी बता दिया । उस सेना को जिसके कारण वह सुरक्षित माहौल मे बोल पा रहा है ।

    oppareek43 के द्वारा
    March 17, 2016

    रमेशजी, आपसे सहमत हूँ कि देश के सम्मान को ठेस पहुँचाना बिलकुल गलत है पर उसकी पहली स्पीच सुने तो ऐसा कुछ नहीं है जिस से सम्मान को धक्का लगे, हाँ ! व्यंग्य जरूर तीखा है. अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता है ही ऐसी कि उसमें अतिशयोक्ति हो जाती है पर एक मज़बूत डेमोक्रेसी इसे जेल सकती है. देशद्रोह का स्टिक्कर लगाना जरूरी नहीं है. फिर कन्हैया तो कथित तौर पर एक वामपंथी व्यक्ति है और वामपंथी विचारधारा सांस्कृतिक विचारधाराओं से मेल नहीं खाती. इसके अलावा इस काण्ड में निहित पॉलिटिक्स तो जगजाहिर है. कम्युनिस्ट और कांग्रेस को मौका मिला है वार करने का और इसमें कन्हैया सहयोग कर रहा है. आपने ब्लॉग का अंतिम पैरा ध्यान से पढ़ा होगा जहाँ मैंने कम्युनिष्टों की काली करतूतों का ज़िक्र करते हुए उसे एक प्रकार की वार्निंग भी दी है. बहरहाल मैं गलत नारे लगाने वालों और कश्मीर की आज़ादी का उद्घोष करने वाले छात्रों के पक्ष में नहीं बल्कि उनके खिलाफ हूँ.

    oppareek43 के द्वारा
    March 17, 2016

    गलती से आपको “रमेशजी” कह कर उत्तर दिया, इसके लिए क्षमाप्रार्थी hoon

Jitendra Mathur के द्वारा
March 17, 2016

बिलकुल सही पारीक जी । आपके इस लेख पर तो आपके पृष्ठ का शीर्षक ‘देख कबीरा रोया’ भी एकदम सटीक बैठता है । सूरत-अ-हवाल का मौजूदा नज़ारा तो कबीरा को रोने पर ही मजबूर कर देता । आपके प्रत्येक विचार-बिन्दु से मैं पूर्णतः सहमत हूँ । इस समय सभी विवेक पर परदा डाले बैठे लगते हैं । सबको सन्मति दे भगवान ।

rameshagarwal के द्वारा
March 16, 2016

जय श्री राम पारीख जी आपके लेख आपके अपने विचार को प्रदर्शित करते लेकिन हम इससे सहमती कुछ बिन्दुओ पर नहीं है किसी भी स्वाभीमानी राष्ट्र में बोलने के आजादी एक सीमा तक ठीक है आतंकवादियो के पक्ष और देश को बर्बाद और तिदने वाले नरो का समर्थन कोइ नहीं कर सकता चूंकि सत्ता की लालची कांग्रेस ने ऐसे ज़हर का पौदा लगाया इसको उखाड़ने में समय लगेगा सरकार ने बहुत अच्छा किया इन लोगो ने सीमा पर मरने वाले सैनिको के बारे में सहानभूति नहीं दिखाई कभी केरला असम,उत्तर प्रदेश पच्छिमी बेंगलो में आर्जकता और राजनातिक हिंसाओ पर विरोध नहीं जताया कन्हैया को हीरो मोदी विरोधी मीडिया ने बनाया लेकिन कुछ दिन का मामला है कोइ पूंछेगा भी नहीं जैसे ही बंगाल और केरला में चुनाव खतम हो जाते असहमत होते हुए भी लेख के लिए साधुवाद.

    oppareek43 के द्वारा
    March 17, 2016

    रमेशजी, एल. एस. बिष्टजी को जो उत्तर दिया गया है . उसे अवश्य पढ़ें. जहां तक सीमा पर मरने वाले सैनिकों के साथ सहानुभूति का प्रश्न है, हम सभी की सहानुभूति उनके साथ है क्योंकि उनका काम ही जान जोखिम वाला है. परन्तु आप ये तो मानेंगें की अन्य सभी विभिन्न कामों में लगे भारतीय भी एक तह से सैनिक ही ही हैं हालांकि उनके काम में सैनिकों की भाँती जान का खतरा काम है. मशीनो पर काम करने वालों, ट्रक ड्राइवरों और दंगों से जूझने वाले पुलिस /मजिस्ट्रेट आदि को भी कभी कभी मरने की जोखिम उठानी पड़ती है. मैं समझता हूँ कि ये सभी , याने आप हम सभी, उसी तरह सहानुभूति के पात्र हैं जैसे कि सैनिक. अब सैनिकों को ज्यादा नंबर देने वाली बात गले से इसलिए नहीं उतरती कि उनका प्रोफेसन ही कुछ ऐसा है कि उन्हें प्राणों कि बलि देनी पड़ती है. परन्तु मैं उन्हें ‘शहीद’ का दर्ज़ा इसलिए नहीं देता क्योंकि वे यह काम, हम सभी कि भांति, रोज़ी रोटी के लिए कर रहे हैं नाकि शहादत के लिए. इस तरह किसी एक तबके को महिमामंडित कर सहानुभूति बटोरना ठीक नहीं. खासकर ऐसे देश में जहां लाखों बाल मज़दूर हमारे हाईवे- ढाबों और रिपेयर शॉप्स में 12 – 14 घंटे कि ड्यूटी देते हैं. क्या वे सैनिक नहीं. जरा बताइये. क्षमा करें आप गलत हैं कि सिर्फ मीडिया ने कन्हैया को हीरो बनाया क्योंकि पुलिस, प्रसाशन और केंद्र सरकार ने भी उसे हीरो बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. मेरे ब्लॉग का आखरी पैर पढेंगें तो पायेंगें कि जी ंकमुनिस्टों के बूते कन्हैया आज यह रासलीला कर रहा है वो कैसे लोग हैं. मैंने तो खुद उसे चेतावनी दी है.

    jlsingh के द्वारा
    March 18, 2016

    आदरणीय पारीख साहब आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. मैंने भी यही लिखा था – किसने बनाया कन्हैया को हीरो? और कन्हैया के भाषणों का कायल तो सभी है तभी आज चारो तरफ यही चर्चा है. बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? कितने पवित्र चरित्र हैं इनके विरोधियों के यह भी छुपा है क्या किसी से? खैर यह तो वक्त बताएगा की कन्हैया का भविष्य क्या होगा पर भाजपा और RSS के लिए खतरे की घंटी जरूर बज गयी है. सादर!


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