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जाट आंदोलन, जातिवाद, देशद्रोह और आरक्षण.

Posted On: 24 Feb, 2016 में

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आज देश का जो सूरतेहाल चल रहा है उस से तो यही लगता है की मोदीजी की सरकार इस दुरूह देश को ना तो ठीक से समझ पा रही है और ना ही संभाल पा रही है. जाट आंदोलन को ही लीजिये. आखिर ब्लेकमेल करने वाले आंदोलनकारियों के समक्ष घुटने ही टेकने थे तो पहले ही दिन मान लेते. आखिर क्योंकर 20 – 22 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा और करीब बीस हज़ार करोड़ की संपत्ति का नुकसान उठाना पड़ा. ज़ाहिर है हरयाणा के मुख्यमंत्री और मोदीजी के चहेते मित्र श्री मनोहरलाल खट्टर इस समस्या को पार पाने में सिरे से अक्षम साबित हुए.


अब अपने जाट भाइयों की बात करते हैं . बेशक देश की सेना, आज़ादी की ज़ंग और कृषि के उत्थान आदि में हमारे जाट समुदाय का बहुत बड़ा योगदान रहा है. यह भी समझ में आता है की आज कृषि के व्यवसाय में आमदनी नगण्य रह गयी है. लिहाज़ा रोज़ी रोज़गार की समस्या इस समुदाय को भी है. इसी के चलते जाटों का युवा समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है. जनतंत्र है सो अपने अधिकार के लिए मांग करना कहीं भी गलत नहीं है परन्तु अगर कुछ गलत है तो वो है अपनी मांग मनवाने के लिए हिंसा को हथियार बनाना.. हरयाणा में यही हुआ है. इस प्रकार की हिंसा, आगज़नी, लूटपाट, ट्रेन ब्लॉक, राजमार्गों पर गुंडागर्दी आदि बातों से जाट समुदाय के प्रति भारत की जनता में जो रही-सही सहानुभूति थी सो भी ख़त्म हो चुकी है. सरकार JNU की नारेबाजी को तो डंके की चोट देशद्रोह बता रही है पर जो लोग देश की राजधानी को जल-आपूर्ति (water supply ) करने वाली नहर को तोड़ फोड़ कर दिल्ली को प्यासा मारना चाहते हैं, वे भी मेरी राय में देहद्रोही से कम नहीं . जब आंदोलनकर्ताओं के सरगना से सवाल किया गया तो उसने जवाब दिया “हम तो भूखे रह कर भी लड़ेंगें पर तुम्हें प्यासा कर के मार देंगें” ऐसे बयान सिर्फ देशद्रोही ही दे सकते हैं..


आरक्षण की बात करें तो यह मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह (मंडल आंदोलन ) के समय से ही तूल पकड़ गया था, तत्पश्चात यह चिंगारी रह-रह के कभी यहाँ तो कभी वहां सुलग-सुलग कर आग की लपट बन जाती है और इसकी चपेट में नाहक ही निर्दोषों के जानमाल की हानि होती है. इसलिए, आरक्षण पर समस्त पूर्वाग्रह छोड़ कर राष्ट्रीय बहस की शुरुआत करनी चाहिए और कोशिश होनी चाहिए कि इस मुद्दे पर देश में आम सहमति बनायीं जाए और जो कुछ भी राष्ट्र हित में हो उस पर अविलम्ब अमल किया जाए वर्ना ये राजनीतिज्ञ इस आग में योंही अपनी रोटियां सेंकते रहेंगें.


जैसा कि हम जानते हैं आज इस देश में छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या को ले कर राजनीति की जाती है जो की दुर्भाग्य का विषय है. अनेक लोगों का मानना है की आरक्षण जाति के आधार पर ना हो कर आर्थिक विपन्नता के आधार पर होना चाहिए. इस मत पर भी गंभीरता पूर्वक विचार विमर्श करना चाहिए क्योंकि बदलते सामजिक परिवेश में किसी भी सिद्धांत को ध्रुव ( absolute ) मान कर चलना ठीक नहीं होगा, अर्थात समयानुसार न्यायोचित बदलाव भी जरूरी है और यह बात आरक्षण पर भी लागू होती है.


गौरतलब है की आज इस देश में हर कोई आरक्षण की मांग करता दिखाई दे रहा है. इनमें ऐसे समुदाय भी हैं जो विपन्न (आर्थिक-सामाजिक रूप से) पिछड़े नहीं हैं फिर भी आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे हैं. मसलन गुजरात के पटीदार (पटेल समुदाय) राजस्थान के गुज्जर, असम के अहोम तथा दक्षिण के कतिपय समृद्ध समुदाय आदि. अब सबको आरक्षण दीजिये तो फिर अवशिष्ट “जनरल कोटा” का क्या बचेगा. एक दिन उच्च-वर्गीय ब्राह्मण-वणिक समुदाय भी आरक्षण की मांग कर सकता है क्योंकि इनमें भी अनेक गरीब तबके के परिवार है. आप ही बताइये किस-किस को आरक्षण दीजियेगा भला. आखिर सरकारी प्रतिष्ठानों (PSUs ) और केंद्र व राज्य सरकार के विभागों में कितनी नौकरियाँ हैं. शायद जनता इस बात से वाकिफ नहीं है की अधिकांस सरकारी प्रतिष्ठानों में पहले से ही जरुरत से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं क्योंकि इनके आका (MD आदि) राजनीतिक मेहरबानी से पद पर आये हैं और पुरज़ोर भाई-भतीजावाद चलाते हैं. वे किसी जरुरतमंद को नौकरी क्यों देने लगे. उधर राज्य सरकारों का ये हाल है कि तनख्वाहें देने लायक आमदनी ही नहीं है तो कितनी नौकरियां दे पायेंगें – आप खुद सोच सकते हैं.. केंद्र सरकार का बजट हमेशा घाटे का बजट रहता है क्योकि फ़िज़ूलखर्ची पर रोकटोक नहीं है .. एक के बाद एक पे कमीशनों ( Pay Commissions ) ने सरकारी कर्मचारियों कि पगार इतनी बढ़ा दी है कि सेलरी देते देते सरकार कि तबियत ख़राब होती जा रही है. गहराई से सोचें तो क्यों सब के सब सरकारी नौकरी के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं ? इस प्रश्न के जवाब में पाएंगे कि लोगों को सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि ‘ऊपरी आमदनी’ का भी लालच है जो सरकारी नौकरी में ही संभव और सुलभ है.


हम सभी जानते हैं कि जिन पिछड़ी जातियों और OBC वर्ग के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान रखा गया उनमें भी कालांतर से एक ‘क्रीमी लेयर’ ( creamy layer ) याने समृद्ध तबका है जो इन प्रावधानों का बखूबी लाभ उठा रहा है.. इस तबके को अारक्षण का फायदा क्यों मिले? इस पर भी विचार करना होगा.


हरयाणा कि घटनाओं से एक बात और उभर कर आई और वो घिनौना जातिवाद. रोहतक के दुकानदारों कि शिकायत है कि आरक्षण-दंगों में एक जाति विशेष को छोड़ कर अन्य जाति की दुकानों को लूटा गया और आग लगा दी गयी. यह बात अगर सही है तो निश्चय ही यह धार्मिक सम्प्रदायवाद से कहीं अधिक खतरनाक है. इस देश में जातिवाद को समूल ख़त्म करना होगा; ऐसा तो सभी कहते आ रहे हैं पर हो नहीं पाया है.. इसे ख़त्म करना है तो सर्वप्रथम अपने नाम में जाति (surname ) के उल्लेख पर रोक लगनी चाहिए. यह सुझाव अटपटा तो लगता है पर इसके कई फायदे भी हैं. आज उत्तरप्रदेश में जहां देखो, जिस थाने पर जाओ; सिर्फ एक ही नाम सामने आता है की थाना प्रभारी से लेकर सिपाही तक ‘यादव’ जाति के लोग हैं. उत्तरप्रदेश और बिहार की सारी राजनीति जाति के आधार पर चलती है जिसके फलस्वरूप लालू यादव जैसे नेता राज्य के मुख्य मंत्री बनते हैं जो भ्रष्ट होने के साथ साथ प्रदेश के विकास पर भी ग्रहण लगा देते हैं.


आज JNU में जो कुछ हुआ वो एक शर्मनाक वाकया है. अव्वल तो राष्ट विरोधी नारे लगने नहीं चाहिए थे और लगे भी तो अफरातफरी में छात्र यूनियन के अध्यक्ष पर बिना पूरी जांच किये देशद्रोह का इलज़ाम लगा कर जेल भिजवाने का कुकृत्य कितना गलत हुआ है ये तो आने वाला समय ही बताएगा पर एक बात तय है कि देश की ‘छात्र राजनीति” अब दो फाड़ में बंट गयी है याने एक तरफ BJP समर्थित ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ) और दूसरी ओर वामपंथ समर्थित कई सारे यूनियन. इस से कालेजों और उच्च शिक्षा संस्थानों का अकादमिक माहौल ज्यादा बिगड़ जाएगा जो देश के लिए ठीक नहीं है. छात्र राजनीति में राजनीतिज्ञों का हस्‍तक्षेप.अब और अधिक हो जाएगा. जहां तक देशद्रोह का प्रश्न है उन नारेबाजों की पहचान (identify ) करो और उसके बाद अदालत डिसाइड करे कि उन्होंने ने देशद्रोह किया अथवा नहीं . बस जो पल्ले पड़ा उसे ही देशद्रोही बता कर अंदर करना कहाँ तक उचित है ये तो अब हफ्ते दस दिन में हाई कोर्ट बता ही देगा पर उन वकीलों का क्या जिन्होंने न्याय के मंदिर को अपवित्र किया. मैं उन्हें भी देशद्रोही मानता हूँ.


कितने दुर्भाग्य की बात है कि आज इस देश में तिरंगे झंडे पर भी राजनीति की जा रही है. कम से कम राष्रीय अश्मिता के प्रतीक तिरंगे झंडे को तो इस गलीज़ राजनीति से अलग रखते.. कोई हर्ज़ नहीं कि सभी शिक्षण संस्थानों में तिरंगा लहराए क्योंकि वह हमारे राष्ट-गौरव का प्रतीक है. पर समझने की बात है कि मैडम स्मृति ईरानी साहिबा को आज यकायक इसकी जरुरत क्यों महसूस हुई.. कोई भी अक्लमंद इस बात के पीछे की मानसिकता को समझ सकता है. चाहे राष्ट्र का झंडा हो या अन्य कोई प्रतीक, वो तो वैसे ही सर्वमान्य है. उसे जबरन लागू करियेगा तो कई सिरफिरे इसमें भी विवाद पैदा कर देंगें जिसकी फिलहाल कोई आवश्यकता नहीं है. अरे भाई, दशकों से लोग “जन-गण-मन” राष्ट्र गीत को सम्मान दे रहे हैं तो फिर ‘ये वन्दे मातरम’ बोलने की कैसी ज़िद्द. खाली खुराफात के लिए ?? मेरा मतलब है खाहमख़ाह क्यों कंट्रोवर्सी पैदा कर रहे हैं. क्या और कोई काम नहीं है आपके पास.


ध्यान से विचार करें तो पायेंगें की दरअसल ये सब मुद्दे ही नहीं होने चाहिए. मुख्य मुद्दा है तो सिर्फ बेरोजगारी का क्योंकि आदमी को अगर इज्जत की रोटी-रोज़गार मिले तो उसे आरक्षण की जरूरत ही नहीं होगी. इसी के पीछे गरीबी उन्मूलन का राज़ छिपा है. अगर लोगों को ढंग से रोज़गार की व्यवस्था हो जाय तो गरीबी स्वयमेव ख़त्म होगी. अगर देश में रोजगार (employment ) में वांछित इज़ाफ़ा नहीं होगा तो ये ये नासूर अराजकता और हिंसा पैदा करेगा. मुझे तो अब इस देश में कोई गांधी , कोई भगत सिंह, सुभाष बोस या सरदार पटेल आता नहीं दिखाई पड़ रहा जो हमें इन आत्मघाती प्रवृत्तियों से रोक सके.


ऐसी स्थिति में मोदीजी जैसे कर्मठ व्यक्ति को चाहिए कि व्यर्थ कि राजनीति छोड़ लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरज़ोर काम करें और यह सिद्ध कर दें कि उनके जैसा प्रधानमंत्री इस देश को आज तक नहीं नसीब हुआ.

-ओपीपारीक43 oppareek43



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