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मुसलमानों ! या तो विरोध करो अथवा नफरत झेलो

Posted On: 6 Feb, 2016 में

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हम सभी जानते हैं कि 1947 में आज़ादी तो मिली पर वो एक रक्तरंजित आज़ादी थी. लाखों बेगुनाहों का खून सांप्रदायिक हिंसा के तहत बहाया गया. परिवार उजड़ गए. बलात्कार, हत्या और जबरन धर्म परिवर्तन किये गए. याने लोगों को बेहिसाब ज़ुल्म सहने पड़े. विभाजन की पृष्टभूमि में दोनों कौमों (हिन्दू-मुस्लिम) को इस त्रासदी से गुजरना पड़ा. आखिर उप महाद्वीप को जिन्ना की ‘द्वी-राष्ट्र’ थ्योरी के चलते एक बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा. जिन्ना, हालांकि ,आधुनिक विचारधारा के राजनीतिज्ञ थे जो कुछ हद तक धर्म निरपेक्षता (secularism ) में यकीन रखते थे मगर दुर्भाग्य से जल्दी परलोक सिधार गए और उनके बाद आने वाले पाकिस्तानी हुक्मरानों में से दो की तो सत्ता संघर्ष में ही मौत होगयी और उनके बाद जो लोग आये वे (भुट्टो को छोड़ कर) सभी भ्रष्ट, नाकारा और कट्टर सुन्नी मुस्लमान थे. इस स्थिति का फायदा सर्वप्रथम अयूब खान ने उठाया. पर थे तो वे एक जनरल सो उन्होंने सदा-सर्वदा के लिए पाकिस्तान का भविष्य सेना के नाम गिरवी कर दिया जो आज तक सेना के पास ही पड़ा है. लिहाज़ा, जब-जब तथाकथित लोकतान्त्रिक, याने चुनी हुयी सरकारें आई भी तो वे सभी सेना की कठपुतली ही बनी रही याने असली सत्ता की डोर हमेशा सेना के हाथ में रही और आज भी उसी के हाथ में है.

बहरहाल, मैं इस के विस्तार में ना जा कर यहां हिंदुस्तानी मुसलमान भाइयों की बात करूँगा. यह इस लिए भी जरूरी है कि आज़ादी के 69 साल बाद भी भारत के मुसलमान इस देश के संविधान से ज्यादा अपने व्यक्तिगत (याने शरीया-सम्मत )विधान के आदेशों को महत्त्व देते हैं जो कि भारतीय लोकतंत्र के बवुनियादी सिद्धांतों से मेल नहीं खाते. उनका तर्क है कि शरीया क़ुरआन-सम्मत है और हर मुसलमान इसके लिए प्रतिबद्ध है. अब क़ुरान में तो ‘काफिरों’ (non – believers ) को मारना भी पुण्य का कार्य है तो इसकी भी इज़ाज़त होनी चाहिए. मार डालिये क्योंकि क़ुरान का आदेश है.

दुनिया के मुस्लिम ये भूल रहे हैं कि अगर मुस्लमान किसी लोकतंत्र (जैसे कि भारत) में रहता है तो उसे उस लोकतंत्र के विधान को मानना पड़ेगा और उसे उचित सम्मान देना होगा क्योंकि और कोई चारा भी नहीं है. क़ुरान की माने तो लोकतंत्र बेमानी हो जाता है. मसलन ‘लिंग-गत बराबरी’ (gender equality ) एक ऐसा सिद्धांत है जो सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के प्राय: सभी लोकतंत्र (democracies ) में है. ये कैसे हो कि औरों पर तो संविधान-सम्मत क़ानून लागू हों और आप पर (चूँकि आप मुस्लिम हो) शरिया लागु हो. शरिया कानून मध्यकाल के मुस्लिम कबीलों के लिए तो ठीक था पर इक्कीसवीं सदी में लोकतान्त्रिक देशों में इसका कोई औचित्य नहीं. बल्कि इस कट्टरपंथी विधान पर दृढ़तापूर्वक आघात करना जरूरी है. अभी कल ही मुसलामानों कि तथाकथित “राष्ट्रिय” संस्था ‘जमीयत’ ने सुप्रीम कोर्ट को को चुनौती देते हुए कहा है कि शरिया के तलाक़ सम्बंधित प्रावधानों में कोर्ट फेरबदल नहीं करे क्योंकि ये क़ुरान द्वारा आदेशित है.

गौरतलब है कि ये शरिया-सम्मत ‘क़ुरानिक’ आदेश लिंग-भेद पर आधारित हैं क्योंकि ये पुरुषों को महिलाओं पर शारीरिक और मानसिक ज़ुल्मो-गारत की इज़ाज़त देते है. कोई दो दशक पहले एक वृद्ध और लाचार मुस्लिम महिला ‘शाहबानो’ ने भी उसके पति द्वारा तलाक़ ( तीन बार बोल कर) दे कर उसे सड़क पर ला खड़ा किया था तो उस महिला ने उस अन्याय के खिलाफ कोर्ट में गुहार की थी कि क्यों नहीं उसे भी देश के संविधान सम्मत कानून के हिसाब से न्याय मिले.. इस पर मुल्ला-मौलवियों में हड़कम्प मच गया. संसद में मामला पुरज़ोर उठाया गया .तत्कालीन कायर प्रधान मंत्री मुल्लाओं से डर गए जबकि उन्हीं के एक केबिना मंत्री (जो स्वयं मुस्लिम थे) ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलना चाहिए और पूरे देश में एक ही नागरिक संहिता (uniform civil code ) लागू किया जाना चाहिए. ऐसा नहीं किया गया और उच्चतम न्यायालय के फैसले को संसद ने निरस्त कर दिया. उन मुस्लिम मंत्री महोदय ने भी विरोध में राजीव गांधी मंत्री परिषद से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कोई एक साल तक इस यूनिफार्म सिविल कोड पर सदन के बाहर कई फोरम पर खासी बहस चली पर आज तक यह कोड नहीं लागू हुआ क्योंकि सबसे अधिक विरोध जमात, जमीयत और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी मुस्लिम संस्थाएं करती हैं. ज़ाहिर है, हमारे राजनैतिक आका मुस्लिम वोट के लालच में इन देशद्रोहियों कि तरफदारी करते हैं.

आम मुस्लिम नागरिक और खासकर मुस्लिम महिलायें शरिया के दमनकारी प्रावधानों से त्रश्त महसूस करते हैं पर मुल्लों और उनके फतवों से डर के मारे इस के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाते. पर ये गलत है. आखिर कब तक चुप रह कर इन कट्टरपंथियों का अन्याय सहन करते रहेंगें. उन्हें इसका विरोध करना होगा. और एक बार को सिर्फ मानने के लिए यह मान भी लें कि सारे मुसलमान ऐसे अन्यायपूर्ण शरिया कानून के पक्ष में हैं तो फिर मेर राय में उन्हें हिंदुस्तान छोड़ कर पाकिस्तान चले जाना चाहिए. आखिर पाकिस्तान बना ही इस आधार पर कि वे हिन्दुओं के साथ एक दोयम दर्ज़े की कौम बन कर नहीं रहेंगें. आज दुनिया में तथाकथित जिहाद चल रहा है सो भी क़ुरान और इस्लाम के नाम पर जघन्यतम अपराधों को अंजाम देने के लिए हो रहा है. पढ़े-लिखे मुसलमान कहते हैं कि इस्लाम शांति का धर्म (a religion of peace ) है तो फिर ऐसा कहने वालों को इन जिहादियों और शरिया समर्थकों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए जो वे नहीं कर रहे हैं.

आज अमेरिका के प्रेजिडेंट पद के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रम्प खुले आम कह रहे हैं कि मुसलमानों के अमेरिका प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए. हालांकि मैं उनकी इस विचारधारा का समर्थन नहीं करता मगर वे जो कह रहे हैं इस से यह तो जरूर साबित होता है कि मुस्लिम कौम के प्रति लोगों कि नफरत बढ़ती जा रही है क्योंकि ना तो उनके दृष्टिकोण में और ना ही उनके क़ुरान-शरीया आदेशों में किसी प्रकार का सुधार (reform ) हो पा रहा है. ऐसे में आप ही बताएं कि लोकतान्त्रिक समाज का अस्तित्व रहे या कट्टरपंथी जिहादियों का ? यह एक यक्ष प्रश्न है क्योंकि IS ने दुनिया को (इस्लाम के नाम पर ) तबाह करने की कसम खायी है. और अगर IS को हमारी शांतिप्रिय विश्व बिरादरी मिल कर समाप्त करती है तो फिर इस्लाम का खात्मा होना भी लाज़मी है क्योंक IS के विष बीज इसी धर्म ने पैदा किये जिसका परिणाम आज विश्व समुदाय भुगत रहा है. जब ‘ हिन्दू कोड बिल’.पास किया गया तो किसी ने विरोध नहीं किया जबकि यह बिल हिन्दुओं कि मनु-संहिता के कतिपय प्रावधानों को न्यायसंगत बनाने के लिए किया गया था. ज़ाहिर है, सामान्यतः हिंदू एक सहिष्णु कौम है इसलिए यह अपने धार्मिक सुधारों को स्वीकार करने से नहीं हिचकिचाती जबकि भारतीय मुस्लिम अभी तक कट्टरपंथियों के बहकावे में आ कर मुल्लों को समर्थन करते प्रतीत होते हैं. फलस्वरूप या तो वे खुल कर अपने इन धर्मांध लोगों का व्यापक विरोध करें अथवा अन्य भारतियों कि नफरत झेलें. .

- ओपीपारीक43oppareek43



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13 प्रतिक्रिया

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Indian के द्वारा
February 14, 2016

इस्लाम के सम्बन्ध में जो बाते आपने कही है . मै इसका खंडन करता हु ……. आधुनिकता अलग चीज़ है और धर्म की जहा आवश्यकता है वह आधुनिकता का कोई काम है हे नहीं जीवन के जिन स्थानो में मनुष्य को आधुनिक होने की आवश्यकता है वो हो हे रहा है ……. मगर इससे उसका मूल स्वरुप नहीं बदल सकता न मिसाल के तौर पर आपके पास मोबाइल है … तो आप इसे अपने शरीर में क्यू नहीं फिट करवा लेते ? शरीर से अलग क्यू रखते है ? जवाब होगा इसलिए क्यू की शरीर में किसी भी बदलाओ के प्रती हम आश्वस्त नहीं है . ये संरचना जैसी है ठीक है ….. बाहर से हम इसे जैसे चाहे किसी चीज़ से जोड़े मगर स्टाइ कोई भी बदलाओ उचित नही है न ही इसकी ज़रुरत है ! बस ऐसे हे इस्लाम धर्म भी है …… जैसे इंसान की १४०० वर्षो में दो नाक नहीं हो गई बल्कि एक है ……. वैसे हे इस्लाम भी अपने समस्त क़ानूनो में सबसे सम्पूर्ण है और इसका १४०० का इतिहास बताता है की आगे भी ये इसी मज़बूती से खड़ा रहेगा ..! आधुनिकता को बाहर बाहर रहने दीजिये………. मूल स्वरुप जी इस्लाम का है वो सम्पूर्ण है ! …. अब अगर कोई किसी के नाम पे अपनी रोटी सके तो उसमे उस व्यक्ती का क्या दोष ……. जब इस्लाम का क़ानून साफ़ है और कोई उसके नाम पर उसी के खिलाफ काम करे ,,,, तो काम से काम आपको तो समझना चाहिए की ये साज़िश है

jlsingh के द्वारा
February 7, 2016

सामान्यतः हिंदू एक सहिष्णु कौम है इसलिए यह अपने धार्मिक सुधारों को स्वीकार करने से नहीं हिचकिचाती जबकि भारतीय मुस्लिम अभी तक कट्टरपंथियों के बहकावे में आ कर मुल्लों को समर्थन करते प्रतीत होते हैं. फलस्वरूप या तो वे खुल कर अपने इन धर्मांध लोगों का व्यापक विरोध करें अथवा अन्य भारतियों कि नफरत झेलें. . बहुत ही सुन्दर और तर्कसंगत आलेख है आपका. मुसलमानों को अपने अंदर परिवर्तन लाना होगा अन्यथा आप जो कह रहे हैं वही होगा … सादर!

    O P Pareek के द्वारा
    February 10, 2016

    आपसे पूर्णतया सहमत हूँ सिंह साहब

    oppareek43 के द्वारा
    February 10, 2016

    सिंह साहब यह तभी संभव है जब इस्लाम में सुधार (reform ) आये जो कि संभव नहीं है क्योंकि मुस्लिम समुदाय क़ुरान को अल्लाह कि वाणी मानते है. बाईबल फिर भी यीशु मसीह का सन्देश है जो मात्र एक पैगम्बर थे. इसलिए क्रिश्चियनिटी में सुधार आया है जबकि मुहम्मद साहब एक पैगम्बर जरूर थे पर कुरान उन्हें अल्लाह से मिली. अब क्या हो सकता है. आखिर ईश्वर की कही गयी वाणी तो बदल ही नहीं सकती. सोचें तो कितनी मूर्खतापूर्ण बात है.

rameshagarwal के द्वारा
February 7, 2016

जय श्री राम मुसलमानों ने अपने धर्म को हिंसा और जबरदस्ती कर के फैलाया.यदि यह धर्म है तो कुआ दुसरे धर्म के पूजास्थलो को तोडना लोगो को जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करना और आतंकवाद के द्वारा जिहाद के नाम पर पुरे विश्व में लोगो का कतला करना कितना जायज़ है इन लोगो की समस्या है की ये किसी की सुनना नहीं चाहते लोक्तंत्र और सेकुलरिज्म इनके धर्म में नहीं केवल भारत में ये कहते वो भी कश्मीर,केरल और बंगाल में नहीं जब हिन्दू कोड बिल पास हो गया उसी वक़्त सामान्य नागरिक संहिता लागू कर देनी चाइये परन्तु नेहरु इन्ही के वंशज थे इसलिए इनके प्रति नम्र हम नाइजीरिया में २१ साल रहे मुसलमान बहुत अच्छे थे लेकिन १९७१ की बंगला देश की युद्ध से भारत से नाराज़ थे.इनको कोइ सुधार नहीं सकता क्योंकि हमारे नेताओ को देश से ज्यादा कुर्सी और वोटो की परवाह है केजरीवाल,कांग्रेस ममता,नितीश लालू देश को भी बेच दे सत्ता के लिए पारीख जी आपके निर्भीक लेख के लिए बहुत साधुवाद और शुभकामनाएं देते है .

    O P Pareek के द्वारा
    February 10, 2016

    रमेशजी, आप तो जानते ही हैं की एक मुसलमान के लिए राष्ट्रीयता से पहले मज़हब आता है और इसके चलते किसी भी तरह का जनतांत्रिक विचार मुस्लिम समुदाय के लिए बेमानी है.

Jitendra Mathur के द्वारा
February 7, 2016

निर्भीक और सटीक विचार हैं पारीक जी आपके । वस्तुतः भारतीय ही नहीं सारे संसार के शांतिप्रिय और विवेकशील मुसलमानों के वास्तविक शत्रु ऐसे ही लोग हैं जो धर्म की आड़ में मध्ययुगीन निरर्थक विचारों और परिपाटियों को थोपने का समर्थन करते हैं और इस्लाम के समक्ष अन्य सभी धर्मों को द्वितीयक श्रेणी का समझते हैं । मेरे मुस्लिम मित्र इस बात की शिकायत करते हैं कि उन्हें उनके धर्म के कारण संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और ग़लत समझा जाता है । मैं उनसे यही कहता हूँ कि अपने धर्म के ग़लत लोगों और उनकी ग़लत बातों के विरुद्ध अपना स्वर ऊंचा करें और उन अन्य धर्मवावलंबियों के दुख को भी समझें और अनुभूत करें जो मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्रों में मुसलमानों के हाथों अन्याय ही नहीं वरन अमानवीय अत्याचार और अपमान सहते हैं । जैसे आप चाहते हैं कि दूसरे धर्म के लोग आपके कष्ट को समझें और आपका साथ दें, वैसा ही आप भी तो उनके लिए कीजिए । ऐसा तो नहीं है कि आपका ग़म ग़म है और उनका ग़म कहानी है, आपका ख़ून खून है और उनका ख़ून पानी है । आप सेक्यूलर लोकतन्त्र रहना भी चाहते हैं और कुरान के हिसाब से भी चलना चाहते हैं जबकि मुस्लिम देशों में से कोई भी सेक्यूलर नहीं है और ऐसे किसी भी देश को सेक्यूलर बनाना चाहते भी नहीं है । यह दोहरे मानदंड ही अन्य धर्मवावलंबियों को विवश करते हैं कि वे मुस्लिमों को संदेह की दृष्टि से देखें । मुस्लिमों की समस्याओं का हल अपने धर्म में सुधार और अपने धर्म के ग़लत लोगों का खुलकर विरोध करने में ही है । अन्यथा सम्पूर्ण विश्व में इस्लाम के विरुद्ध जो आक्रोश बढ़ता जा रहा है, उसे रोका नहीं जा सकता ।

Dr S Shankar Singh के द्वारा
February 7, 2016

प्रिय श्री पारीक जी, सादर नमस्कार. आपके पिछले आलेख से मैं बहुत असहज महसूस कर रहा था. अब सारी स्थिति स्पष्ट हो गई है. आपके स्पष्ट एवं सटीक विचारों के लिए मैं आपका अभिनन्दन करता हूँ. ईसाईयों के बारे में भी मेरा मत है की वे भी अन्य धर्मावलम्बियों को हेय दृष्टी से देखते हैं. ईसाई बात चीत करने में चतुर होते हैं. बातें सेक्यूलरिज़्म की करते हैं लेकिन असली सामान्य जीवनमें अपनी धार्मिकता का ही पालन करते हैं. ये महापाखंडी हैं. मैं जानना चाहूँगा कि दुनिया का कौन सा इस्लामिक या ईसाई देश सेक्युलर है.

    O P Pareek के द्वारा
    February 10, 2016

    जितेंद्र मथुरजी, हमेश की तरह सही और संतुलित विश्लेषण. हाल ही में एक नया शब्द जुड़ा है – “इस्लामोफोबिया” याने इस्लाम का खौफ. अब इसके जिम्मेदार कौन है. आप खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं. यह फोबिया फैलता है तो समझिए किसी के लिए भी लाभदायी नहीं याने अतिशय नुकसानदेह है.

    O P Pareek के द्वारा
    February 10, 2016

    डाक्टर साहब, आपने सही फ़रमाया. धर्म की बात छोड़िये बल्कि ये लोग तो इस कदर पाखंडी हैं की गोरे – काले में भी भेद करते रहे हैं और आज तक इन देशों में रंगभेद सामाजिक स्तर पर जारी है.

Shobha के द्वारा
February 7, 2016

श्री पारिख जी बहुत अच्छा लेख जिन्ना जबकि आधुनिक विचारों के थे परन्तु उन्होंने पाकिस्तान भारत मैं दो राष्ट्रीयताये हैं के नाम पर मांगा था इस्लामिक लोग वहां प्रमुखता से थे पाकिस्तान की पॉलिसी भी मजबूत देश भारत से टककर ले सके और मुस्लिम दुनिया का लीडर बनना था आज उसी का परिणाम है जेहादी शक्तिशाली हो रहे हैं पाकिस्तान को भी चैन से जीने नहीं देते | ज्ञान वर्धक लेख

    के द्वारा
    February 7, 2016

    शोभाजी , आपसे सहमत हूँ । धन्यवाद ।


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