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जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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विगत (2015 ) की विदाई और आगत (2016 ) का स्वागत

Posted On: 19 Jan, 2016 Others में

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इसमें कोई शक नहीं की विगत वर्ष देश और दुनिया दोनों के लिए एक ऐसा साल गया जिस का असर (अच्छा या बुरा ) बची हुयी २१ वीं शताब्दी पर पड़ेगा. देश की बात करें तो इसी साल श्री मोदी ने सत्ता की कमान को मजबूती से थाम लिया. हालांकि वे २०१४ में ही चुनाव जीत कर आये थे पर शासन पर पकड़ २०१५ में हो सकी. जब उनकी जीत को एक साल हुआ था तो मीडिया और जनता ने उनके इस साल भर का आकलन किया तो पाया कि कुछ ख़ास काम नहीं हो पाया याने उम्मीदों पर खरे नहीं उत्तर पाये. इसके दो कारण थे. एक तो चुनावी सभाओं में उनका जरुरत से ज्यादा बड़बोलापन और दुसरे इतने काम समय में जनता की अपेक्षाएं पूरी कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था. लोग उन्हें ‘मसीहा’ समझने की भूल कर बैठे जो वे कतई नहीं हैं पर बेशक एक बहुत काबिल प्रधानमंत्री और जनप्रिय नेता वे अवस्य है जिनकी छवि दर्पण की तरह साफ़ है, अगर आप गुजरात के दंगों की बात छोड़ दें तो. और वहां भी कोर्ट ने उन्हें क्लीन चिट दे रखी है. बहरहाल 2015 में आर्थिक सुधारों का आगाज़ होना था वो भी दो कारणों से नहीं हो सका. एक तो वकीली पेशे से आये जेटलीजी का ढुलमुल रवैया और दूसरे कांग्रेस पार्टी का अड़ियल रवैया जिसके चलते लम्बे समय से ठन्डे बस्ते में पड़ा GST तक नहीं पास हो सका, कांग्रेस के इस रवैये को देश विरोधी की संज्ञा दें तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी, इसमें भी कोई संदेह नहीं की बिहार विधान सभा के नतीजों ने BJP को यह स्पष्ट कर दिया है की श्री मोदी के साथियों के गैर ज़िम्मेदाराना बयानों को जनता माफ़ नहीं कर पायी. BJP यह भूल गयी कि नीतिश ने अपने कार्यकाल में ठोस काम किया था जिसे बिहार की जनता सराहती है और उन्ही कि वजह से लालू जैसे भ्रष्ट परिवारवादी नेता को JDU से अधिक सीटें मिल गयी. याने लालू के जंगल राज को लाने में BJP ने भी परोक्ष रूप से भूमिका निभायी.


जब ये ब्लॉग लिखा जा रहा है उस समय भारत तो क्या पूरे विश्व की अर्थ व्यवस्था चरमरा गयी है. इन हालात में वित्त मंत्री को कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए पर लगता है उतना साहस उनमें शायद नहीं है. रूपया लगभग 68 प्रति डॉलर पर पहुँच गया है. उधर युआन के अवमूल्यन से पूरे विश्व की अर्थ व्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है. तेल के भाव आशातीत नीचे (28 $ प्रति बैरल) होना कोई ख़ुशी वाली बात नहीं है क्योंकि सिर्फ सस्ता तेल पा कर भारतीय अर्थ व्यवस्था सुधरेगी – ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि विश्व के विकसित देशों में चीन और भारत के सामानों कि मांग भी तो होनी चाहिए जो कि अब पूरी तरह गिर चुकी है, खासकर चीन जो पूरी तरह निर्यात (export ) पर निर्भर है बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इन हालात में मोदी सरकार के लिए देश कि अर्थ व्यवस्था को दुरुश्‍त रखना सबसे बड़ी चुनौती है.भारतीय शेयर बाजार का इस तरह लुढ़कने का मतलब होगा बड़े निवेशकों का विश्वास गिरना और छोटे निवेशकों का आर्थिक नुकसान.  मंदड़िए अभी से हावी होते नज़र आ रहे हैं और अगर समय रहते कुछ नहीं किया गया crisis अवश्यम्भावी है
अब भारत की विदेश नीति पर आते है.  मोदीजी के दौरे उनकी नज़र में सही होंगे पर इसका आकलन होना चाहिए कि देश को इन यात्राओं से क्या लाभ मिला.  मानता हूँ दोस्तियां बढ़ी तो कुछ बातों का लाभ भी मिला.  मसलन बांग्लादेश ने असमिया अलगाव वादियों को हमारे हवाले किया. इसी प्रकार म्यांमार ने भी नाग्रो उग्रवादियों को वहाँ से खदेड़ा. पर ये तो ऐसे देश हैं जिन्हें विकास के लिए भारत की जरुरत है. लेकिन पाकिस्तान जो नियमित रूप से हमारे देश में आतंकवाद का निर्यात करता है उसे ठीक करने का जो फार्मूला मोदीजी अपना रहे हैं वो ठीक नहीं. इधर वे नवाज शरीफ के जन्मदिन पर और बेटी की शादी के मौके पर उन्हें मुबारकवाद देने जाते हैं और उसी समय सेना और ISI पठानकोट के एयर बेस में आतंकवादियों को भेज कर पीठ में छुरा भोंकते हैं. अर्थात वाजपेयीजी की लाहोर यात्रा से हमारे प्रधानमंत्रीजी ने कोई सबक नहीं लिया. सोचें तो कितने आश्चर्य की बात है. जब तक आप उनके आतंकवादी कैम्पों पर हमला नहीं करेंगें ये सिलसिला इसी तरह चलता रहेगा.


लेखकों और कलाकारों ने जब सम्मान वापस किये तो BJP और मोदी समर्थकों ने उनपर गालियों और तोहमतों की बौछार कर दी.  उनका यह कहना की असहिष्णुता का वातावरण कतई नहीं है सो तो उनका लोकतान्त्रिक अधिकार है पर इस से इतर राय रखने वालों को और उन लेखकों पर लांछन लगाना सिर्फ ये साबित करता है की BJP और उसके समर्थक बेशक असहिष्णु लोग है, स्वयं इस ब्लॉग के लेखक ने जब उन लेखकों के समर्थन में फेसबुक या ट्विटर आदि में लिखा तो इन मोदी भक्तों ने भद्दी भाषा और गालियों की बौछार कर दी. अरे भाई आप किसी से सहमत नहीं है तो सिर्फ इतना कहिये कि वे उसकी बात से सहमत नहीं हैं और उसके पीछे जो दलील हो वो भी शिष्ट भाषा में दे सकते हैं. जैसा व्यवहार इन्होने असहिष्णुता के समर्थको के साथ किया (याने गाली गलौज और कांग्रेस या मुस्लिम समर्थक होने का आरोप आदि) वो सब इस देश के लोकतंत्र के लिए घातक है. श्री नरेंद्र मोदी क्योंकर इन लोगों पर चुप्पी साधे रहे वो तो वे स्वयं ही जानते हैं.


अगर गौ-मांस खाना गलत है तो इसके लिए कानून लाएं और विधि अनुसार ऐसा करने वाले को सजा दें. कई राज्यों में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध है भी फिर भी सरे आम गायें कसाइयों को बेचीं जाती है और ये बेचने वाले भी तथाकथित हिन्दू जातियां है.  अब कानून का परिपालन तो होता नहीं और किसी बेचारे के यहां कोई गौमांस (????) का टुकड़ा मिल गया तो उसकी जघन्य हत्या कर दो. ये कैसा लोकतंत्र हुआ. लेखक को इस बात से कोई शिकायत नहीं कि गौ मांस बेचना-खाना कानूनन प्रतिबंधित हो परन्तु ऐसे प्रतिबन्ध को ठीक से लागू करना भी तो सरकारों का काम है.


अब आइये दुनिया कि और चलते हैं. 2015 में यूरोपीय देशों की विकास दर का भट्टा बैठ गया. ग्रीस एवं कुछ अन्य देशों का तो दिवालिया तक निकल गया था और उसे बचाने के लिए IMF को आगे आना पड़ा. इसी प्रकार BRICS के देशों को लें तो सिर्फ भारत को छोड़ कर सभी की हालत पतली है. विश्व आर्थिक समुदाय को सबसे बड़ा धक्का चीन की और से से मिला जिसे अपनी करेंसी का अवमूल्यन करना पड़ा तथा उसने विदेशी मुद्रा के जखीरे को बेचने का सिलसिला शुरू कर दिया. जो चीन सारी दुनिया को माल बेच कर विश्व अर्थ व्यवस्था पर हावी हो चूका था वो आज घरेलू उपभोक्ताओं (domestic consumption ) पर जोर दे रहा है.


अगर मुस्लिम राष्ट्रों की बात करें तो सीरिया- इराक-लीबिया के झमेलों की वजह से आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी शैतान संस्था का जन्म हुआ और उसका नाम है ISIS जिसने पिछले सभी शैतानों मसलन हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन, माओ आदि को अपने कारनामों से मात दे दी. निरपराध महिलाओं एवं बच्चों का बलात्कार और हत्या, हज़ारों को गुलाम बना कर उनकी खरीद फरोख्त, विरोधियों और कैदियों की नृशंस हत्या, बेटों द्वारा मातापिता की हत्या, अनेक देशों में सुसाइड बॉम्बर भेज कर आतंकवाद और हत्या. याने शैतान की डिक्शनरी में शायद ऐसा कोई भी कुकृत्य नहीं है जिसे ISIS ने अंजाम नहीं दिया. हालांकि ISIS को ख़त्म करने की मुहीम तो शुरू हो चुकी है परन्तु इनका समूल सफाया करने में अभी समय लगेगा क्योंकि आज भी इराक, सीरिया और लीबिया के अनेक इलाके इनके कब्जे में हैं जहां से वे अपने अपराधों को अंजाम देते हैं.


इसी बीच २०१६ की शुरुआत में ही ईरान द्वारा न्यूक्लियर समझौते पर अमल करने से अमेरिका और ईरान के बीच जो मूक युद्ध था वो समाप्त हुआ याने अमेरिका ने ईरान पर से प्रतिबन्ध sanctions हटा लिए जिस के कारण ईरान द्वारा मुक्त व्यापार की सभी बाधाएं दूर हो गयी है. यह एक शुभ शुरुआत है.
coninued ……………….कृपया भाग -2 देखें …………………………………………………………………………………………………………………………………..

-ओपीपारीक43oppareek43



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
January 20, 2016

जय श्री राम पारेख जी आप ने निर्भीक हो लिखा हम कुछ बातो से सहमत नहीं बीजेपी पर और मोदी जी को दोष देना फैशन हो गयी क्या असहिष्णुता का राग अलापने वाले और अवार्ड वापसी वाले दादरी पर इतना बोले लेकिन मालदा पूर्णिमा और फतेहपुर में जब मुसलमानों ने कहर दहय हिन्दुओ और पुलिस को आतंकित किया कोइ नहीं बोला कोइ नेता नहीं गए कांग्रेस समझती है की देश में राज करना गांधी परिवार का जन्मसिद्ध अधिकार है लेकिन उसकी गूंदागार्दी पर मीडिया बुद्धिजीवी चुप हिन्दुओ पर अत्याचार पर सब चुप क्या कह्रीवल लालू ममता आज़म खान की भाषा क्या मर्यादित है मोदी जी ने पकिस्तान को एक मौक़ा दिया इसके बाद देश देखेगा कांग्रेस के ६३ साल के कूड़े को साफ़ करने में समय लगेगा.बिहार बीजेपी की वजह से नहीं सिधान्थीं गठ बंधन  की वजह से क्या ये शर्म की बात नहीं की लालू ऐसा अपराधी और भ्रष्टाचारी नेता हो गया देश के लिए कलंक है.आप तो बहुत वरिस्ट सदस्य है इतने अच्छे लेखो में प्रतिक्रियाये क्यों?बुद्धीजीवी क्यों सुस्त य़

    O P PAREEK के द्वारा
    January 20, 2016

    आदरणीय रमेशजी, मैं आपके अधिकाँश विचारों से सहमत हूँ परन्तु लेखकों ((award returnees) की निंदा करना भी तो एक फैशन बन गया है.देखिये मैं यह लॉजिक नहीं समझ पाया हूँ कि अतीत के दंगों आदि के समय क्यों नहीं बोले . चलिए नहीं बोले पर इस से उनका हमेशा के लिए बोलने का अधिकार तो नहीं ख़त्म हो जाता.. असल बात तो यह है कि अवार्ड वापसी को कांग्रेस पार्टी के पक्ष में देखा जा रहा है और साथ साथ यह सोच भी कि वे उस पार्टी के एहसानों का बदला या वफादारी निभा रहे हैं..पर ध्यान से देखें तो सारे ऐसे लोग नहीं है. वाजपेयीजी (अशोक ) को ही लीजिये, बहुत काम लोग जानते हैं के वे अटलजी के निकटतम मिटों में से एक रहे हैं तथा कि ideology में यकीन नहीं करते. उनकी अंतरात्मा ने जो कहा वही उन्होंने किया और फिर ये तो लोकतंत्र है किसी के विरोध के तरीके को ले कर आलोचना सही नहीं पर इस देश में तो इन लेखकों कि आलोचना भी शिष्ठता कि हदें पार कर गयी. यह कहाँ तक उचित है. देश के मुस्लिम , मालदा या पूर्णिया जहां कहीं भी हों अगर हिन्दुओं पर अत्याचार करे तो सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.इनमेंसे कुछ कि मानसिकता आतंकवादी तो पाकिस्तान समर्थक भी है जिसे मैं देशद्रोह मानता हूँ. जहां तक आज़म खान, ओवैसी, लालू, ममता और मुलायम आदि का प्रश्न है उनकी सारी गलतबयानी वोटों को ले कर है क्योंकि वे मुस्लिम वोटों के बगैर जीत नहीं सकते. बहरहाल इसमें कोई शक नहीं कि एक लम्बे समय बाद हमें मोदीजी जैसा करिश्माई और ईमानदार प्रधानमंत्री मिला है. और ये भी सच है कि ६० सालों के कूड़े कचरे को एक-दो साल में नहीं मिटाया जा सकता. उन्हें चाहिए कि वे गली मोहल्लों के कूड़े कचरे के अलावा राजनीती के कचरे का भी कोई स्वच्छता अभियान चलाये पर उनके साथ मुश्किल ये है कि उनके कई अपने मंत्री गैर ज़िम्मेदाराना बातें करते हैं जिस से श्री मोदी की छवि को निर्मल नुक्सान पहुँचता है. इसी लेख का भाग -2 पढ़ कर अपने प्रतिक्रिया जरूर देने का कष्ट करें.


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