देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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आइये कुछ फिल्मों;, कुछ गानों की बात करें

Posted On: 2 Jan, 2016 Others में

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नया साल नए पैगाम ले कर आया है सो राजनीति आदि की बात कर मन का स्वाद नहीं खट्टा करना चाहता . वैसे भी छोटा मोटा कवि होने के नाते ये दिल फूलों, फव्वारों, बुलबुल, गीतों और प्यारी यादों से आतंरिक खुशियाँ पाता है सो क्यों ना आज कुछ फिल्मों और फ़िल्मी गानों की बात की जाए.
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वैसे तो मैं सदा से हिंदी, अंग्रेजी और और बंगाली फिल्मों का प्रेमी रहा हूँ सो कई यादगार हिंदी फ़िल्मी गीत ज़हन में बिना दस्तक दिए जब-तब उभरने लगते हैं. पर आज इन्ही सन्दर्भों में कुछेक अंग्रेजी फिल्मों को याद करने का मन हो रहा है. तबका याने साठ के दशक का कलकत्ता और एक दुबला पतला कॉलेजिया लड़का होता था. पूरा फिल्मबाज़ पर जेब से फटेहाल. उस सस्ती टिकटों के ज़माने में भी अक्सर जेब में इतने पैसे ही नहीं होते थे कि अपनी पसंद की हरेक फिल्म के शोज देख सके पर इसके बावजूद पाकेट मनी और पेट काट कर मनपसंद फ़िल्में देख ही लेता था. अंग्रेजी फिल्मों का चश्का नया-नया लगा था और आप तो जानते ही हैं की नया-नया इश्क कैसी बला होता है. क्लास बंक कर चोरी छुपे फ़िल्में देखता था. जिनमें कुछ की यादें आज भी दिल को ख़ास तरह की ख़ुशी देती हैं. अंग्रेजी फिल्मावलोकन के इस दौर में जो पहली फिल्म जो मैंने देखी (जहां तक याद पड़ती है) वो थी ” Americanization of Emily”. जरा सोचिये यह एक एडल्ट फिल्म थी और मैं तब शायद 17 – 18 साल का बालक रहा हूँगा सो आप कल्पना नहीं कर सकते की उस जमाने में यह कितनी थ्रिल वाला अनुभव रहा होगा याने जब हीरो ने हीरोइन से किश करने के लिए लिपलॉक किया तो ऐसे लगा जैसे साँसें रुक जायेगी. ऐसा दृश्य जीवन में पहली बार देखा. और इसके बाद तो सिलसिला चलता रहा. “The World of suzie wong ” , ” Guns of Novaron ” , ” The Longest day ” और अन्य अनेक अंग्रेजी फ़िल्में देखी जिन्हें याद कर कर के आज दिल में रश्क होता है और स्कूल कालेज के वो मस्त दिन फिर से ज़हन में ताज़े होने लगते हैं

आइये अब उस ज़माने के हिंदी फिल्म संगीत की बात करते हैं . फ़िल्मी गाने सुनने का शौक बचपन से था. शायद छटी कक्षा में था तब घर वालों से छुप कर काशीपुर (कलकत्ता ) की रीजेंट टाकीज में छह आने वाली जनता टिकट ले कर गुरुदत्त की सी. आई . डी. फिल्म चोरी छुपे देखी और उसके मस्‍त गानों का दीवाना हो गया. जैसे कि ‘आँखों ही आँखों में इशारा हो गया, बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया’ और “लेके पहला पहला प्यार भर के आँखों में खुमार जादू नगरी से आया है कोई जादूगर आदि. जो मिठास ओ. पी. नैयर के संगीत में थी वो आज तक देखने को नहीं मिली. हिंदी फिल्मों का उस ज़माने का संगीत शायरी और स्वरबद्धता की एक अद्भुत मिसाल थी जो अब नहीं पर आज भी अपने मित्र रामगोपाल (सखा ) से उन गानों को तरन्नुम में सुनता हूँ तो मस्‍त हो जाता हूँ. यहां भरत व्यास और वसंत देसाई का ज़िक्र करना चाहूंगा जिन्होंने वी. शांताराम की फिल्म ‘नवरंग ” में गीत और संगीत का एक अद्भुत मेल प्रस्तुत किया. एक भावुक कवि के जीवन पर आधारित इस फिल्म की परिकल्पना शांताराम ने उन दिनों की थी जब (दो आँखें बारह हाथ फिल्म की शूटिंग के दौरान) एक दुर्घटना में एकबार को उनकी आँखों की रौशनी चली गयी थी. उनकी इस मनोदशा में जो कहानी शतरंज के मन में उपजी उसके अनुरूप ही उस फिल्म का कहना और संगीत था और खासकर “तूं छुपी है कहाँ, मैं तड़पता यहां, तेरे बिन सूना-सूना है दिल का जहां ” जिस तरह फिल्माया गया वैसा अद्भुत song picturization आज तक किसी फिल्म में नहीं देखा गया. दरअसल इसमें गाने के बोल, सिचुएशन और संगीत का जबर्दस्‍त संगम हो पाया था जो शांतरामजी की एक बड़ी उपलब्धि थी.. इसी प्रकार “आधा है चन्द्रमा, रात आधी भी एक बेहद सुन्दर गीत संगीत के समन्वय वाला दृश्य था..

आइये अब अंग्रेजी गीत संगीत के बारे में मेरे नितांत व्यक्तिगत अनुभव की बात करूँगा. तब मैं कालिज में था और “My Fair Lady ” कलकत्ता में रिलीज़ हुयी थी. पूरी फिल्म के संवाद काव्य (कविता ) में थे. और साथ कई अच्छे गाने थे जिन्हें मैं गुनगुनाया करता था. ऑड्रे हेपबर्न जिन्होंने उस फिल्म में एलिजा डूलितल का रोल किया था उनका अभिनय और डायलॉग डेलिवरी कमाल की थी और वे बेहद सुन्दर अभिनेत्री भी थी जिनके अभिनय ने उस फिल्म में चार चाँद लगाए. यह फिल्म मैंने तीन बार देखी और कड़का हो गया था. यह सम्भवतः 1963 – 1964 की बात होगी जब इस फिल्म ने भारत में धूम मचाई थी और इसका एक बड़ा कारण इसका संगीत भी था. इसके बाद एक फिल्म “South Pacific ” आई जो बहुत अच्छे प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण संगीतमय (musical ) थी वो भी मैंने देखी. पर जो फिल्म मुझे हमेशा याद रहेगी वो है “Sound of Music ” क्योंकि तब मेरी शादी के शायद दो या तीन दिन ही हुए थे जब मैं अपनी नयी नवेली दुल्हन को ग्लोब सिनेमा हॉल में साउंड ऑफ़ म्यूजिक दिखाने ले गया उसे भी यह फिल्म बहुत पसंद आई और उसके एक से बढ़ कर एक गानों की तो बात ही क्या करें, वो तो ऐसे थे जिन्हें संगीत प्रेमी गुनगुनाया करते. “I am sixteen going on seventeen” एक ऐसा ही सुन्दर गाना था, जो मुझे विशेष पसंद था।

जहां तक बॉलीवुड के हिंदी फिल्म गीत संगीत का प्रश्न है सो अगर लिखने बैठूं तो एक पूरी किताब ही लिख मारूंगा सो आज के लिए बस इतना ही.खुदा हाफिज.. .

- ओपीपारीक43oppareek43



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
January 6, 2016

पुरानी यादें ताज़ा कर दीं पारीक जी आपने । याद आ गया बड़ी मुश्किल से थिएटर में फ़िल्म देख पाने और दूरदर्शन पर फ़िल्म देखने के लिए पूरे सप्ताह प्रतीक्षा करने वाला ज़माना । अब तो चैनलों पर चौबीस घंटे फ़िल्में आती हैं लेकिन बहुत-सी पुरानी फ़िल्में अव्वल तो अब प्रसारित ही नहीं होतीं और अगर कहीं सीडी या इंटरनेट पर मिल भी जाती हैं तो कटे-फटे स्वरूप में । मंज़रों को वक़्त यादों में बदल कर चल दिया पारीक जी । अब न वो कथाएं रहीं, न वो संगीत और न ही वो क्रेज़ । बहुत-बहुत अभिनंदन आपका इस सुंदर लेख के लिए । नववर्ष के अवसर पर लिखने के लिए इस विषय को चुनकर आपने बिलकुल ठीक किया ।

    O P Pareek के द्वारा
    January 19, 2016

    धन्यवाद माथुरजी, आपको अच्छा लगा, यही मेरा सौभाग्य है.

Shobha के द्वारा
January 6, 2016

श्री पारिख जी आपने उस जमाने की याद दिला दी जब फिल्मों का सबमें बहुत क्रेज होता था फ़िल्में भी बहुत अच्छी होती थी परन्तु लड़कियों को माता पिता कम ही इजाजत देते थे फिर भी सब ग्रुप बना कर देखने जाती थी मनोरंजक लेख पढ़ने में बहुत अच्छा लेख गलती से आपका नाम गलत लिखा गया

    O P Pareek के द्वारा
    January 19, 2016

    धन्यवाद, शोभाजी . आपने सही कहा पर अब उतनी पाबंदियां नहीं रही. समय बहुत बदल गया है. एक समय था जब हम जासूसी उपन्यास भी पाठ्यपुस्तक के बीच दबा कर पढ़ते थे कि कहीं अभिभावक या टीचर देख ना लें. फिल्मों का बहुत शौक रहा और अब भी है सो पुरानी फिल्मों के विषय में एक और अच्छा लेख इस ब्लॉग में दूंगा. बस आप प्रतीक्षा करें और अपनी प्रतिक्रिया इसी प्रकार भेजती रहें तो उत्साह बना रहेगा.

Shobha के द्वारा
January 6, 2016

श्री पार्क जी आपने उस जमाने की याद दिला दी जब फिल्मों का सबमें बहुत क्रेज होता था फ़िल्में भी बहुत अच्छी होती थी परन्तु लड़कियों को माता पिता कम ही इजाजत देते थे फिर भी सब ग्रुप बना कर देखने जाती थी मनोरंजक लेख पढ़ने में बहुत अच्छा लेख


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