देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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यह असहिष्णुता (intolerance ) नहीं तो और क्या है ?

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आज जब मैं ये ब्लॉग लिख रहा हूँ तो कुछ भय सा लगता है क्योंकि पिछले साल-डेढ़ साल में एक ऐसा माहौल बन गया है की जब भी वर्तमान प्रधान मंत्री, उनकी सरकार या फिर उनकी पार्टी के बारे में कुछ भी आलोचनात्मक बात कहें या लिखें तो भाई लोग गला पकड़ने लगते हैं. मेरा मतलब है गाली-गलौज और तमाम अभद्र विशेषणों की झड़ी लगा देते हैं. अब इसे आप intolerance (असहिष्णुता ) नहीं कहेंगें तो और क्या कहेंगें. यकीन ना हो तो मेरी फेसबुक पर ऐसे कॉमेंट बहुतायत से मिलेंगें.एक ने लिखा के “अबे साले तूं मुसलमान है क्या, अपनी माँ से जा कर पूछ”. गया मुस्लमान होना इस देश में कोई गुनाह हो गया. एक और ने लिखा मोदी तो खुद भगवान का अवतार है, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी भगवन की बुराई करने की. और ना जाने क्या-क्या . सिलसिला अभी जारी है.

मैं खुद एक अदना सा कवि/लेखक हूँ सो अवार्ड लौटाने वाले लेखकों के पक्ष में अपने विचार जब सोशल मीडया में व्यक्त किये तो ऐसी-ऐसी जबर्दश्त प्रतिक्रियाएं आई जिनमे मेरे और उन बेचारे लेखकों के बारे में ना जाने क्या-क्या कहा गया. कोई उन्हें कांग्रेस के दलाल बता रहा है तो कोई लेफ्ट के टट्टू तो कोई उन्हें वैश्या तक कि संज्ञा दे रहा है , आदि इत्यादि.. हद होती है अभद्रता कि पर जनाब आप किसी को क्या कह सकते हैं, डेमोक्रेसी है. कुछ भी बको जायज है.

जहां तक अवार्ड लौटाने का सवाल है प्रधान मंत्रीजी, राष्ट्रपतिजी, अनुपम खेरजी और अन्य कई हस्तियों ने इसे गलत करार दिया है. कुछ ने तो इसे विपक्षियों द्वारा प्रेरित कहा है क्योंकि इनमें कतिपय लेखक (सब नहीं) वाम पंथी विचारधारा के रहे हैं और अन्य कुछ का सम्बन्ध कांग्रेस से भी रहा है पर अधिकांस लेखक स्वतंत्र विचार धारा के हैं और उहोंने अवार्ड इस लिए वापस किये क्योंकि उनके मतानुसार देश में एक ऐसा माहौल बना है जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति के खिलाफ है. उनका यह भी कहना सही है कि चार नामी गिरामी लेखकों/बुद्धिजीवियों कि ह्त्या पर प्रधान मंत्री ने (जो वैसे तो बहुत बोलते हैं और लोगों से “मन की बात” भी करते हैं ) चुप्पी साध ली. यह कथन सवा सोलह आना सही भी है . जो लोग उनके इस रवैये से आहत हुए, उन्होंने अपने अवार्ड वापस लौटा दिए तो मेरे ख़याल में कुछ गलत नहीं किया. ओड़िया भाषा के महानतम साहित्यकारों में से एक मोहन्तीजी ने कल ही अपना पद्मविभूषण अवार्ड लौटाया है तो ये लोग शायद उन्हें भी कांग्रेस का पिट्ठू बता दें तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि वास्तव में यहां असहिष्णुता का माहौल बना हुआ है.

मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं कि वे इस अवार्ड वापसी को गलत बता रहे हैं क्योंकि लोकतंत्र में सभी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है परन्तु यह शिष्ट ढंग से होना चाहिए, ना के आप किसी के लिए गाली गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग करें .

रहा सवाल अवार्ड वापसी का तो यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े लेखक ने अवार्ड वापस किया हो. रबिन्द्रनाथ टैगोर और फणीश्वरनाथ रेणु ने भी अवार्ड वापस किये थे. कई लेखकों ने तो दुनिया का सर्वोच्च पुरुष्कार याने नोबेल प्राइज भी लेने से इंकार कर दिया था. प्रसिद्द लेखक अर्न्स्ट हेमिंग्वे उनमें से एक हैं. देखिये जिसे पुरूस्कार मिला है वह व्यक्ति उसे लौटाने का अधिकार भी रखता है, बशर्ते इसके पीछे कारण हो. और यहां बेशक कारण मौजूद था. असहिष्णुता है जिसका उदहारण मैं प्रथम पैरा में दे चुका हूँ. इतना शाब्दिक विष वमन अगर सोशल मिडिया में जप लोग कर सकते हैं तो वे सामने पा कर आपकी पिटाई भी कर सकते हैं. आप कहेंगें इसमें मोदीजी और सरकार का भला क्या कसूर है. बेशक है क्योंकि अगर ऐसी लफ्फाजी और हिंसा तथा मंत्रियों के गैर ज़िम्मेदाराना वक्तव्य उनके अपने मंत्री और नेता करें तो इसमें मोदीजी का फ़र्ज़ बनता है की वे इस पर प्रभावी ढंग से रोक लगाएं वरना मैं तो यही मानूगा कि मोदीजी भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार हैं .



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बीजक के द्वारा
January 4, 2016

Also reminds me of a line in one of Nusrat Fateh Ali Khan’s kawwalis – God save us from the Godly ones. …बस हमें शेख जी आप जैसे, अल्लाह वालों से अल्लाह बचाये… Very well said.

Pardeep Kumar के द्वारा
January 3, 2016

पारीक जी, मैं आपसे सहमत नहीं हूँ। यह देश सदियों से सहता ही आया है। यदाकदा किसी ने विरोध भी किया तो उसे असहिष्‍ण्‍ाु बताने की बजाय लोग देश को ही असहिष्‍णु बताने लग जाते हैं। मैं तो कहूँगा कि आज मीडिया की अतिरिक्‍त सजगता ही हमें अधिक उग्र बना रही हैं। लेकिन हम असहिष्‍णु नहीं है। यदि ऐसा होता हो मैं आज जीवित न होता। मैं पिछले कई वर्षो से लिख रहा हूँ। जब भी धर्म पर लिखा (चाहे इस्‍लाम हो या हिन्‍दूु या ईसाईयत या सिख हो या बौद्ध या रविदासी हो) सभी ने मुझे गालियां ही दी हैं। हॉं आप आज इसे झेल रहे हैं मैं 30 वर्ष से यह झेल रहा हूँ। जानता हूँ यह चंद लोगों कि उग्रता है जो हमारे अवार्ड वापिस करने वालों ने भी दिखाई है। और भद.दा लिखने वालों ने भी। लेकिन देश अभी भी सहिष्‍णू है। 

बीजक के द्वारा
January 2, 2016

पूर्णतः सहमत आपसे. बहुत बढ़िया लिखा. गाली गलौज तक तो बात ठीक है, लेकिन अब नौबत ये है की मार-पीट, हत्या, मुह पर डाई फेंकना, एसिड अटैक करना भी सही है – अगर आपकी बीजेपी या मोदी से सहमत नहीं हैं तो. और दूसरों के ऐब गिनाने से सब माफ़ हो जाता है. और अगर आप कोई कहें जो हिन्दू-वादियों को पसंद नहीं,तो आप पाकिस्तानी ही होंगे. वहीँ चले जाईये. क्योंकि कश्मीरी पंडितों के साथ अन्याय हुआ, तो दादरी में बेगुनाहों को मारना उचित है. क्योंकि सिखों को मारा गया, इसलिए अब बीजेपी को तो सरे खून माफ़ होने ही चाहियें. सभी की भावनाएं इतनी जल्दी जाती हैं. जैसे हमारी ५००० साल पुरानी संस्कृति कोई थोड़ी बहुत निंदा से ढह जाएगी. जैसा अमरीका में बच्चों को पाठ पढ़ाया हमारे भारत में भी सीखना चाहिए. Sticks and stones will break my bones But words will never harm me. बीजक

OM DIKSHIT के द्वारा
November 27, 2015

आदरणीय पारीक जी, नमस्कार. आप के विचार से मैं कुछ हद तक सहमत हूँ.फ़रवरी 15 में मेरे भी लेख ….दिल्ली चुनाव …एक पैगाम …पर कुछ लोगों की गन्दी प्रतिक्रिया आई थी,और कुछ ऐसा हुआ कि उसके बाद समयाभाव के कारण मैं कुछ लिख नहीं पाया.पता नहीं कि …वे लोग उनके समर्थक थे या उनके विरुद्ध- प्रचारक I.2014 के लोक सभा चुनाव के समय भी और उसके बाद भी सोशल -मीडिया पर मोदी के विरुद्ध लिखने वालो को …ऐसे विकृत-व्यक्तियों का सामना करना पड़ा या पड़ रहा है.लेकिन इसे देश की असहिष्णुता से जोड़ना उचित नहीं है.सशक्त-लेखनी ऐसे …विकृत लोगों से नहीं डरती.यदि ऐसा होता तो आज़ादी के पूर्व या इमरजेंसी के बाद सभी की लेखनी चुप हो जाती.एवार्ड को देश की मर्यादा से जोड़ कर देखना चाहये न कि भाजपा से,मोदी से या ….विकृत-मानसिकता वाले समर्थको से.

Jitendra Mathur के द्वारा
November 26, 2015

आपकी बात सोलह आने ठीक है पारीक जी । मैं सहमत हूँ आपसे ।

jlsingh के द्वारा
November 25, 2015

वही तो!

rameshagarwal के द्वारा
November 24, 2015

जय श्री राम मोदीजी और इस सरकार की बुराई करना और आरोप लगाना बुद्धिजीविओ की आदत है.कश्मीर से इतने हिन्दू निकले गए,८४ में सिख मारे गए और इतने दंगे हुए उसपर असहिष्णुता नहीं दिखाई गयी और इतने लोगो ने एक साथ अवार्ड नहीं लौटाए इतने दिनों तक हिन्दू द्वतीय श्रेणी के नागरिक बनाये गए तब कोइ नहीं बोला असहिष्णुता बंगाल,केरल,कर्नाटक ,असम और उत्तर प्रदेश में है उसपर चुप मुसलमान तो दामादो की तरह रहते और बहुत समझदार है की एकझुठ हो कर वोट दिला कर नेताओ को खुश करदेते जबकि हिन्दू बंटे हुए है इतिहास से सबक नहीं सीखा.एक अयोध्या में मंदिर तक तो नहीं बन्ने देतेमहाराणा प्रताप और शिवाजी की जयती नहीं मनाती कांग्रेस परन्तु टीपू सुल्तान और औरंगजेब या आतंकियों को महामंडित किया जाता है देश और नेता महान है.हिन्दुओ से ज्यादा सहिष्णुता किसी और दुसरो में नहीं इसीलिये गुलाम बने.


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