देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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ये क्या हो रहा है, दादरी है या बीमारी ?

Posted On: 12 Oct, 2015 Others में

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राष्ट्रपति मुखेर्जी की सलाहियत के बाद मोदीजी ने चुप्पी तोड़ी भी तो भला कैसी कथनी रही उनकी. साफ़ साफ़ नहीं कहा गया कि दादरी में जो कुछ हुआ वो माफ़ करने लायक नहीं है. माना की दादरी या उस से भी भयानक घटनाएं पहले भी हुई है परन्तु इसकी पृष्ठभूमि और पश्चात की जनप्रतिक्रियाओं को देखें तो आप पायेंगें कि अब राष्ट्र में ऐसी धार्मिक असहिस्णुता बीमारी कि शक्ल अख्तियार करती जा रही है. लोग संस्कृति कि दुहाई दे कर बीफ खाने को दुष्कृत्य बताते हैं परन्तु उनका संस्कृति ज्ञान बिलकुल छिछला और मनगढंत जान पड़ता है. जहां तक राजनीती का सवाल है वह इस मुद्दे को वोटों के लिए भुनाने में जुटी है. परिणामस्वरूप एक ऐसा ध्रुवीकरण का घिनौना खेल खेला जा रहा है जिसके चलते हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे को दो फाड़ में काट कर देश को सांप्रदायिक आग में झुलसना लाजमी हो जाएगा.


लोग भूलते हैं कि जिस संस्कृति कि और गौ-माता आदि प्रतीकों कि बात की जा रही है वह सदा से एक चलायमान संस्कृति रही है और उस संस्कृति का क्रमिक विकास (evolution ) हुआ है जिसमें कि आर्य, द्रविड़, हूण, अरब, ग्रीक और मुग़ल आदि अनेक संस्कृतियों का स्वतः समावेश होता गया. यह गर्व का विषय है कि इस धरती ने उन तमाम संस्कृतियों को समेट कर एक ऐसी “साझा संस्कृति” को जन्म दिया जिसने हिन्दुस्तान को दुनिया के तमाम मुल्कों में सिरमौर राष्ट्र बनाया है. आक्रमणकारी अपनी अपनी अलग संस्कृति का परचम लहराने आये मगर यहां कि संस्कृति ने उनकी संस्कृति को भी अपने में आत्मसात कर एक ऐसी संस्कृति का निर्माण किया जो सदैव अक्षुण्ण रहेगी. अगर आप इसे समझना चाहते हैं तो इसके ऐतिहासिक परिदृश्य को समझना जरूरी है. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की लिखी पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” पढ़ के देखिये तो शायद मेरी बात समझ में आ जाएगी. जहाँ तक मांस (या गौमांस ) भक्षण का प्रश्न है प्राचीन भारत में ऐसा होने के प्रमाण उपलब्ध हैं, गया ये बात और है की तथकथित हिंदुत्व का परचम लहराने वालों के गले से नहीं उत्तर पा रही. लिहाजा वे उत्पात करने पर आमादा है. दादरी ही क्यों हाल-फिलहाल चार ऐसे विद्वान और स्वतंत्र सोच वाले बुद्धिवादियों की निर्मम हत्या कट्टरपंथियों ने इस लिए कर दी क्योंकि वे लोग उनके मिथ्या-पाखंड पूर्ण धार्मिक विचारों के खिलाफ लिखते या बोलते थे.


रहा सवाल इस देश के मुसलमानों का सो वे भी इस देश की संतान है बल्कि उस साझा संस्कृति के दावेदार हैं जिसने भारत को कुछ और नयापन दिया, फिर चाहे वो वास्तु (architecture ) हो , शेरो शायरी हो, उर्दू जबान हो, संगीत हो कत्थक नृत्य हो , मुग़लई व्यंजन हो या फिर पहनावा हो. इस साझा संस्कृति को कुछ लोग “गंगा-जमनी तहजीब” भी कहते हैं जो सही है. आज कुछ सिरफिरे लोग इस साझा संस्कृति का खात्मा करने में जुटे हैं.तनिक मंथन करेंगें तो पाएंगे कि भारत कभी असहिष्णु नहीं रहा है संभवतः आपको पता होगा कि देश के तमाम कुशल हश्त कलाओं के कारीगर मुस्लिम थे और उनकी परंपरागत कला ने देश को सम्मान दिलाया. बनारसी साडी को ही लीजिये, कितनी नायाब कलाकृति होती हैं ये साड़ियाँ जिन्हें हर हिन्दू दुल्हन शादी के जोड़े में पहन कर इतराती हैं. ये सब इस साझा संस्कृति कि ही देन है.


अक्सर लोग पडोसी देश पाकिस्तान के बर्ताव का हवाला दे कर नफरत का औचित्य ठहराते हैं पर मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि क्या वे यहां भी पाकिस्तान जैसे कठमुल्लों और सैनिक तानाशाहों का मंजर देखना चाहते है. मेरे भाई आप किसी गुंडे-मवाली से अपनी तुलना क्यों करते हैं. उनका तो वजूद ही नफरत कि नीव पर टिका है. वहां के हुक्मरान तो जिहादियों की फसल तैयार करते हैं जब की हमारे प्रधानमंत्री देश में सर्वांगीण विकास लाने में जुटे हैं. उन्होंने सही कहा है की लड़ना है तो गरीबी से लड़ो, आपस में लड़-मर कर क्यों बर्बाद होते हो.


मैं नहीं समझता बीफ खाना कोई बहुत बड़ा अपराध या भारतीय संस्कृति का अतिक्रमण है. अगर यह गलत भी है तो कानून अपना काम करे आप (हिंसा करने वाले) को किसने यह ठेकेदारी दी है कि आप किसी निरीह के घर में घुश कर बेरहमी से उसकी हत्या कर दो. इन हत्यारों को फांसी कि सजा होनी चाहिए.


जहां तक बीफ का सवाल है विशेसग्यों का कहना है कि भैंश और गाय के मांस में फर्क कर पाना असंभव प्राय है ऐसे में कौन फैसला करेगा कि किसी ने गौ मांस खाया या भैंश का. अव्वल तो इस पर पाबन्दी है ही नहीं , पाबंदी तो सिर्फ गौहत्या पर है, मांस खाने पर नहीं. यह भी कानूनी जटिलता है. प्रतिबन्ध दोनों पर ही लगना चाहिए. हम सब जानते हैं कि देश के कई राज्यों में गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है फिरभी यह कृत्य बदस्तूर जारी है क्योंकि भ्रष्ट राज्य सरकारें इस प्रतिबन्ध का प्रतिपालन नहीं कर रही जो कि दुर्भाग्य पूर्ण बात है.


गौरतलब है कि कसाइयों को गाय बेचने वाले अधिकांस हिन्दू होते हैं. उन्हें पता है कि ये कसाई उनकी गौमाता के साथ क्या सलूक करेगा फिरभी पैसों के लालच में गाय को काटने के लिए बेच देते हैं. अखलाक़ को मरने वालों को चुनौती देता हूँ कि वे इन अप्रत्यक्ष (गाय बेचने वाले) हत्यारों कि भी ह्त्या कर के दिखाएँ तो तो जानूँ कि आप वास्तव में गौ रक्षक हो वरना इस पाखंड में क्या आणि-जानी है. ये तो सिर्फ देश में साम्प्रदायिकता का जहर घोलने का नुस्खा है. फिर बेचारे मुस्लमान ही क्यों ‘बौद्ध’ भी बीफ से परहेज नहीं करते.इसके अलावा अनेक NRI हिन्दू वहाँ अमेरिका में जा कर मजे से बीफ खा रहे हैं. उनपर और उनके घर वालों पर भी तो हमला करो यारों. .

- ओपीपारीक43 oppareek43



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