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कांग्रेस - विनाशकाले विपरीत बुद्धि

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कांग्रेस देश की एकमात्र पार्टी है जिस पर देश की जनता ने हमेशा भरोसा किया. जाहिर है की स्वतंत्रता के 65 सालों में इसी पार्टी ने सर्वाधिक समय राजसत्ता का सुख भी भोगा परन्तु देश का यही सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी रहा क्योंकि दो पार्टियों को छोड़ कर तीसरी कोई भी पार्टी आज तक केंद्र में बहुमत नहीं पा सकी है और आज तो यह किसी भी एक पार्टी के लिए संभव नहीं रहा. इस प्रकार देश में आज तमाम बाद इन्तजामी और भ्रष्टाचार के लिए इसी पार्टी को सर्वाधिक जिम्मेदार मानना उचित होगा. आज यह बात और स्पष्ट रूप से समझ में आरही है की गांधीजी ने आज़ादी मिलने के बाद इस पार्टी को ख़त्म करने की सलाह क्यों दी थी.

वैसे तो कांग्रेस में नेहरु गाँधी परिवार का बोलबाला शुरू से ही रहा है पर इंदिरा की सर्कार आने से ले कर जिस तरह चाटुकारों, मक्कारों और बेईमानों का वर्चस्व पार्टी में बढ़ा है उस से देश का कितना नुकसान हुआ है सो देश की जनता अब भलीभांति समझ पा रही है. इस परिवार के जो दो लोग पार्टी पर काबिज हैं उनका इसके पहले, सिर्फ खानदान छोड़, कोई राजनैतिक या सामाजिक योगदान नहीं रहा है. अभी पिछले दो सालों में जो घोटाल हुए हैं, वे सब के सब इनकी रजामंदी से हए हैं वरना जमाई बाबू की हेराफेरी पर इन्हें फ़ौरन कार्रवाई करनी चाहिए थी. वकीलों की एक पूरी फ़ौज (तिवारी, सिब्बल, मनु सिंघवी आदि) जो अपने तर्कों-कुतर्कों से हर गलत बात को जायज ठहराने की कोशिश करती है हालांकि ये पब्लिक है सब जानती है.

कांग्रेस की मेहरबानी से लालू, मुलायम और मायावती जैसे भ्रष्ट नेताओं की पार्टियों को मौका मिला है और ये लोग जो कांग्रेस से भी कई गुना अधिक भ्रष्ट हैं, आजकल चांदी काट रहे है. ममता के जाने के बाद कांग्रेसी गठबंधन सरकार को इनकी जरुरत उतनी ही है जितनी प्यासे को पानी की जहां तक इनका सवाल है इनका तो वैसे भी कोई धरम-ईमान नहीं. इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के केस ठन्डे बसते में डालो और अपनी रोटी सेंको, कांग्रेस की बस यही पालिसी है.

कभी स्कूल में पढाया जाता था की मुग़ल-वंश के पतन के कारण लिखो तो सबसे पहला नाम औरंगजेब का आता था अब जब कांग्रेस का इतिहास लिखा जायेगा तो सबसे पहला नाम सोनिया गाँधी का आएगा. अभी अभी 2014 के चुनावों के लिए आठ लोगों की जो समन्वय समिति कांग्रेस ने बनायीं उसके मुखिया राहुल गाँधी है. उत्तर प्रदेश में इस बालक की नादानी से कांग्रेस का जो हश्र हुआ वो तो आप देख ही चुके हैं अब 2014 के चुनाव में क्या होने वाला है इसका अंदाजा लगाने के लिए ज्यादा सर-खपाई की जरुरत नहीं है. मैं कांग्रेस का ‘एंटी’ नहीं हूँ बल्कि कतिपय कारणों से बी.जे.पी. का ‘एंटी’ जरूर हूँ फिर भी यह कहना चाहूँगा की यह पार्टी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है. गली, घाट, चौराहों जहां भी जाता हूँ लोगों के मुख से अक्सर सुनता हूँ की इस बार कांग्रेस को वोट नहीं देना है.
इसे भी आप एक सर्वेक्षण मान सकते हैं. दरअसल बेचारी जनता इनकी गन्दी राजनीती और भ्रष्टाचार से भी उतनी परेशान नहीं लगती जितनी की महंगाई से. लोगों का जीना दूभर हो गया है और इनके वकील-मंत्री टी.वी. पर बैठ कर राजनीतिक प्रलाप और गाली गलौज करते रहते हैं , इन हालात में चुनावों की बागडोर राजकुमार राहुल गाँधी को देने से तो और भी बंटाधार होने वाला है.

अब तो यह कहने को मजबूर होना पड़ता है कि “विनाशकाले विपरीत बुद्धि”.

-ओपीपारीक43 oppareek43



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 16, 2012

ओपी जी, विश्लेषण अच्छा है परंतु चिंता इस बात की नहीं होनी चाहिए कि सरकार कौन बनाएगा या नहीं…शायद यही सवाल है जिसमें जनता को उलझाया जाता है। केवल आंकड़ों और सर्वेक्षणों से कुछ नहीं होता जब तक जन जागरूक न होंगे तब तक कैसे चलेगा। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें आपने सपा, बसपा सबको भ्रष्ट करार दिया है और यहां पर महज कुछ उपहारों की खातिर लोगों ने सपा को ही पूर्ण बहुमत से जिता दिया और यह तब हुआ जब तमाम लोग जनजागरण का झंडा लिए घूम रहे थे। ऐसे में कांग्रेस आएगी, डूबेगी चली जाएगी या कौन आएगा या नहीं, सवाल यह महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि जनता की असली सरकार आएगी या नहीं…..

    omprakash pareek के द्वारा
    November 19, 2012

    आप के विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ.

pitamberthakwani के द्वारा
November 16, 2012

मैं भी किसी पार्टी का न होते हुए कहना चाहता हूँ की लगता है की कांग्रेस से लोग उकता गए है इसलिए २०१४ काचुनाव क्या रंग लाएगा नहीं कहा जा सकता है! पर क्या बी.जे.पी.भी बेईमान नहीं है और कौन है ईमानदार?पारीक साब अब तो जो आयेगा लूटेगा ही, कारण यह है की सबको मालूम हो गया है की सब चोर है! किसी के द्वारा किसी को वोट देने और न देने से जनता को कोई राहत नहीं मिलनेवाली है! सो जनता चाहे वोट किसीको भी दे या न भी दे तो म्माहंगाई से मरना ही होगा! अब तो गद्दर होना चाहीये जिसमे तीनो सेनाओं के अंग विद्रोही बनकर काग्रेस के नेताओं को गोलियों से भून दें! जैसा ईराक और पाक में होता रहा है और कोई चारा है ही नहीं !

    omprakash pareek के द्वारा
    November 19, 2012

    पिताम्बरजी, वैसे तो जो ‘समाधान’ आपने सुझाया, भारत की अधिकांस जनता इन चोरो से तंग आ कर, कुछ ऐसा ही सोचती होगी, जैसा आप सोच रहे हैं. यह आक्रोश कुछ हद तक सही है परन्तु मेरी राय में लोगों को ‘जोश’ में ‘होश’ नहीं खोना चाहिए क्योंकि सैनिक बगावत समस्या का कोई समाधान नहीं है. कालांतर में ये सेनायें ही ‘डिक्टेटर’ बन जाती हैं. याद करिए इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी को जो एक तरह का ‘दिक्तेटोरी,i समाधान जैसा ही था पर उसमें भ्रष्टाचार और अधिक बढ़ा और कुछ चंद लोग देश की व्यवस्था चलाने लगे. जरुरत जन जागरण की तो है ही और साथ साथ हमें भी सुधरना होगा. हर घूस लेने वाले के पीछे एक देने वाला भी होता है. अगर ये देने वाले सुधर जाएँ तो लेने वाले स्वयं ठीक हो जायेंगें. मानता हूँ की देने वालों की मज़बूरी है पर अगर “देने से इंकार” का एक आन्दोलन व्यापक स्टार पर चले तो भ्रस्ताचार में ८०% तक कमी संभव है. देखिये आप और हम सभी पैसे को अनावश्यक महत्त्व देने लगे हैं. अंधाधुन्द खर्च और ऐश करने वालों को इज्जत देते समय यह कभी नहीं पूछते की यह धन कैसे कमाया. शादियों में देखिये, कोई रिश्तेदार अनाप शनाप खर्च करता है हर बाराती को कीमती गिफ्ट देता है तो अधिकांस मध्यमवर्गीय लोग उसके गुण-गान करते नज़र आते हैं जबकि हो सकता है की ये सब काली कमाई से हो रहा हो. जहां तक तीनों सेनाओं के जनरलों द्वारा बगावत का सवाल है वे भी इसी मिटटी से पैदा हुए हैं, आसमान से नहीं टपके हैं. शायद आपको पता होगा की डिफेन्स के महकमे में जबरदस्त भ्रष्टाचार है. अभी हॉल में जनरल वी.के. सिंह ने आरोप लगाया था के सेना के एक उच्च पदासीन अफसर ने उन्हें घूस देने की पेशकश की थी. इसी से अंदाजा लगा सकते हैं.


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