देख कबीरा रोया

जहॉं दु:ख शब्‍दों में उमड़ आया, जहॉं मन के भावों ने पाई काया....

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दो जवान जिंदगियां और तबाही के अफ़साने

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दो जिंदगियां . दोनों जवान. दोनों अतिशय महत्त्वाकांक्षी. दोनों ही भ्रमित. यथार्थ से दूर. राजनेताओं का नागपाश और दोनों ही उसमें ज़कड़ी दोनों का ही निर्मम व दुखद अंत. दोनों ही समाज के लिए और खासकर महत्वाकांक्षी युवाओं के लिए एक सबक. दोनों ही मीडिया के लिए मौके का गरम मसाला. दोनों ही राजनीतियों की काली करतूतों की मिसाल.

मैं जाटलैंड हरयाना की गीतिका शर्मा और अनुराधा बाली (उर्फ़ फिजा) की बात कर रहा हूँ. फिजा की 4 -5 दिन पुरानी  सढ़ी गली लाश उनके निवास से मिली. गीतिका ने आत्महत्या की और एक ख़त (सुसाईड नोट) भी छोड़ गयी है. पुलिस दोनों मौतों की तफ्तीश कर रही है और हम इस बारे में कुछ भी नहीं कहना चाहते; हम तो सिर्फ इन घटनाओं की सामाजिक और राजनीतिक पक्ष की बात करेंगें.

खुद गीतिका के परिवार ने माना की वो कांदा (गृह राज्य मंत्री – हरयाना) के करीबी थे, रिश्तेदार नहीं. स्वाभाविक है की गीतिका के साथ उसकी नजदीकियों और तमाम मेहरबानियों पर उनकी मूक रजामंदी थी; यह जानते हुए भी की बेटी (जो कांदा की एयरलाईन में मात्र एक एयर होस्टेस) में ऐसी कोई बड़ी योग्यता नहीं थी की उसे ऊंचे और बड़े बड़े ओहदों से नवाजा जाय पर कांदा ये सब करते रहे. महँगी BMW कार दी, कंपनी का डायरेक्टर बनाया, गोवा भेजा आदि इत्यादि.फेमिली सब देखती रही. कुछ ना बोली. परिवार और समाज दोनों को ही इस बात की तवक्को ना हुयी की भाई एक साधारण शिक्षित लड़की पर आप इतने मेहरबान क्यों है. आम तौर पर लोगों को माल और रूतबा दिखाई देता है तो फिर एतराज़ क्यों करे. शहरी समाज को तो वैसे भी कोई मतलब नहीं होता. पड़ोस के घर में क्या होता है उन्हें क्या लेना देना.. जहां तक इस देश के नेताओं का सवाल है वे तो अधिकांस या तो गुंडे हैं या फिर गुंडे पालते हैं. कांदा पर दस गंभीर आपराधिक मुक़दमे थे पर कांग्रेसी कल्चर का पालन करते हुए हुदा ने उसे गृह मंत्री बनाया. पुलिस उसी के अंतर्गत आती है.

अनुराधा की शादी हरयाना के उप-मुख्यमंत्री चंद्रमोहन से हुयी थी कभी और उनके इश्को-इसरार (कभी-कभी तकरार) के किस्से मीडिया ने चटखारे ले-ले कर टी वी पर दिखाए थे. ये जनाब काफी अरसे तक बिना किसी को बताये लापता रहे.ऐसे महान उप-मुख्यमंत्री हिन्दोस्तान में ही हो सकते हैं. वैसे भी खून भजन लाल का था जो कभी हरयाणा के मुख्य मंत्री होते थे और कांग्रेस के भ्रष्ट तम नेत्ताओं में से एक रहे थे. चंद्रमोहन और अनुराधा दोनों ने शादी का फैसला कर लिया पर हिन्दू होने के कारण पहली पत्नी के रहते मिस्टर ‘चाँद’ दूसरी शादी नहीं कर सकते थे सो इस्लाम कबूल कर दोनों ने शादी करली. बाद में पत्नी के दबाव में अलगाव हुआ. जूनून की हद तक महत्वाकांक्षी ‘फिजा’ ने मीडिया में तमाम अनर्गल प्रलाप किये जैसे इस प्रकरण में उनका कोई दोष ना हो. फिल्मों में जाने की ठानी, राजनीति में आने की सोची पर असफल रही. वापस चंडीगढ़ (मोहाली) आ गयी और एकाकी जीवन व्यतीत करने लगी. पांच दिन पहले उनका जो हुआ वो ऊपर बता दिया गया है या यों कहिये की अब इतिहास बन गया है.

की समाज, मीडिया, राजनीतिग्य और मान-बाप, परिवार-परिजन इन घटनाओं से सबक लेंगें. संदेह है. बहरहाल दो बहुमूल्य जिन्दगिया बर्बाद हो कर काल के मुख में चली गयी. यह कोई बलिदान नहीं था बल्कि मूर्खता, महत्वाकांक्षा और स्वार्थ का भयावह परनाम था.


- ओपीपारीक43 oppareek43



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
August 11, 2012

आदरणीय पारीक जी, सादर ! “”"यह कोई बलिदान नहीं था बल्कि मूर्खता, महत्वाकांक्षा और स्वार्थ का भयावह परिणाम था.!”"”" बिलकुल सही बात !

    omprakash pareek के द्वारा
    August 13, 2012

    शाशिभूशंजी, टिपण्णी के लिए धन्यवाद.

yogi sarswat के द्वारा
August 11, 2012

श्री पारीक साब ! नमस्कार ! जब तक मलाई खाने को मिलती रहे , बिल्ली मटका नहीं फोडती ! लेकिन ऐसा कहकर मैं किसी अपराधी की तरफ दारी नहीं कर रहा हूँ ! आपने एक हकीकत बयान की है ! समय मिले तो मेरे ब्लॉग को समय दें ! धन्यवाद

    omprakash pareek के द्वारा
    August 13, 2012

    योगीजी, आपके कमेंट्स को मैं पूरी तवज्जो और रेस्पेक्ट देता हूँ. अगस्त और सितम्बर का महिना काफी व्यस्त रहता है प्रेक्तिस्नार्स के लिए. फिर भी आपका ब्लॉग अवस्य पढूंगा, धन्यवाद.

vaidya surenderpal के द्वारा
August 10, 2012

पारीक जी नमस्कार , आजकल सही गलत, नैतिक अनैतिक को अनदेखा कर केवल पैसा और मौज मस्ती ही जीवन का ध्येय बन गया है । इससे समाज मेँ सांस्कृतिक जीवन मूल्य हाशिए पर चले जा रहे हैं । ऊपर से भ्रष्ट राजनेताओँ ने आग मेँ घी डालने का काम किया है । समाज के युवाओँ को संस्कारित करके ही भटकाव के रास्ते से रोका जा सकता है ।

    omprakash pareek के द्वारा
    August 13, 2012

    सुरेन्द्रपाल जी , लगता है लोग संस्कार के मायने ही भूल चुके हैं. भटकाव रोक पाना मुस्किल होगा.

yamunapathak के द्वारा
August 10, 2012

पारीक जी आप की बातों से सहमत हूँ.yahaan भी मुख्या प्रश्न parivaar और समाज के mulyon kaa hee hai.

    omprakash pareek के द्वारा
    August 13, 2012

    यमुनाजी, जैसा की हम सभी जानते हैं नैतिक और सामाजिक मूल्यों का द्रुत गति से ह्राष हुआ है और यही वजह इस भटकाव की है. आप की बात सोलह आने सही है.

seemakanwal के द्वारा
August 7, 2012

आदरणीय पारीक जी सादर नमस्कार .आप ने सही लिखा है .एक पल में सब कुछ पा लेने की चाहत का ‘का परिणाम है .

    omprakash pareek के द्वारा
    August 13, 2012

    सीमाजी, आपके कमेन्ट के लिए धन्यवाद स्वीकार करें,


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